बुधवार, 17 अगस्त 2016

सुन रे मानव अब तो संभलो

3:30:00 pm
अब तो संभलो

सुन रे मानव अब तो संभलो, मत प्रकृति से खिलवाड़ करो।
तुम हो कर्ता की उत्तम रचना, मत वनों का संहार करो।।

जिस कर्ता ने तुझे संवारा,
लोभ के वश हो उसे उजारा।
                         जीवनदायिनी पेड़ उखारे,
                         छिन्न—भिन्न कर दिये नजारे।।

जो तेरा है जीवन—रक्षक, जिस वायु से होते पोषित।
बड़े—बड़े उद्योग लगाकर, उस वायु को किया प्रदुषित।।

पर्वत को भी नहीं है छोड़ा,
यहां वहां हर जगह से तोड़ा।
                            वन उजाड़े और नदी को बांधा,
                            प्रकृति की हर सीमा को लांघा।।

जिसने ये संसार बनाया,
जीवन—ज्योति धरा पर लाया।
                           कृत्य भला ये कैसे सहता,
                           मूक—बधिर सा कब तक रहता।।

अति दोहन से जल स्रोत सुखाये,
बूंद—बूंद को जी तरसाये।
                          कहीं बाढ़—रूपी आयी विपदा,
                          और कहीं है बादल फटता।।

कहीं बाढ़ है, कहीं सूखाड़,
चहूं ओर मचा है हाहाकार।
                          चेत—चेत अब भी 'शुभेश',
                          बस पेड़ लगा और पेड़ लगा, वरन् नहीं बचेगा कुछ भी शेष।।

''प्रकृति के अंधाधूंध दोहन की यह परिणति है।
पेड़ बचाओ, हरियाली लाओ, तभी हमारी होगी सद्गति है।''
                                                             ............शुभेश
(विभागीय पत्रिका में प्रकाशित)

मंगलवार, 9 अगस्त 2016

सातवां पे कमीशन : अच्छे दिन आएंगे ?

12:42:00 pm
सातवां पे कमीशन : अच्छे दिन आएंगे ?

पे कमीशन आया, सातवां पे कमीशन आया।
सभी कर्मचारियों को अंगूठा दिखाता, पे कमीशन आया।
भैया पे कमीशन आया, सातवां पे कमीशन आया।।

पे कमीशन ने भैया बस लक्ष्य यही इक ठाना है।
गुजर—बसर करते जैसे, वो बंधुआ मजदूर बनाना है।।
जब दिल्ली वालों ने लाख रूपये कर लिए वेतन।
तब चुप्पी साधे बैठा रहा पे कमीशन ।।

आटे—चावल का जाने कौन—सा मोल—भाव किया।
मात्र 18000 रूपये का न्यूनतम वेतन, भारत सरकार को रिपोर्ट दिया।।
15750 से बढ़ाकर 18000 का वेतन, कुल 2250 रूपये बढ़ाने वाली।
सभी सरकारी कर्मचारियों की खिल्ली खूब उड़ाने वाली।।
ये सरकार तो और निराली निकली।
खुद को भामाशाह बताने वाली निकली।।

मीडिया में खूब बढ़ा—चढ़ा कर पेश किया।
वेतन आयोग को ऐतिहासिक घोषित किया।।
वाकई वेतन आयोग तो ऐतिहासिक है।
द्वितीय वेतन आयोग से भी न्यूनतम वृद्धि, ऐतिहासिक तो है।।

हमारे माननीय सांसद कहते हैं, 
50000 में उन्हें अतिथि को चाय तक पिलानी मुश्किल है।
भारत की गौरवशाली परंपरा का,
दायित्व निभानी मुश्किल है।।

​फिर हमें वही सांसद 18000 में पूरे परिवार चलाने कहते हैं।
सहर्ष कैबिनेट प्रस्ताव पास करती, विरोध के स्वर नहीं उठते हैं।।
खुद एक सत्र भी कार्य किया और पूर्ण पेंशन तक प्राप्त किया।
लेकिन हम सरकारी सेवक, 60 वर्ष की उम्र तक कार्य करें।
फिर भी पेंशन लाभ से मरहूम रहें।।

इन सब बातों से वेतन आयोग को कोई सरोकार नहीं।
उन्हें सरकार से मतलब है, सरकारी सेवक से बेमतलब का प्यार नहीं।।

पहले दिल्ली वाले विधायक, लाख रूपये कर गए खुद का वेतन।
अब मुम्बई वालों ने कर लिए 2 लाख रूपये अपना वेतन।।
काश हमें भी ऐसे अधिकार मिले होते।
कम—से—कम रोटी दाल के पूरे पैसे लिए होते।।

अब थोड़ी—थोड़ी बात समझ में आती है।
महलों में रहने वाले को रोटी—दाल का भाव कहां पता चल पाती है।।
अब तो मोदी जी का दिखाया सब्जबाग भी लूट गया।
हां अच्छे दिन आएंगे ये सपना "शुभेश" का टूट गया।।