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शुक्रवार, 4 नवंबर 2022

नयन नीर भरि रोए बकरिया

2:39:00 pm

नयन नीर भरि रोए बकरिया


नयन नीर भरि रोए बकरिया,

कोन कसूरवा मोर हे।

घासे पाते हम चिबाबी

नै किनको त हम सताबी,

करी ने हम बलजोर हे।


अपन बच्चा सन मनुखक बच्चा

दूध पीएलौं, बूझि के सच्चा

लाज ने आबै तोर हे।


शुभ अवसर तोहर घर आओल

मंगलगीत सखी सब गाओल

हमहूँ नचितौं जोर रे।


कोन कसुरवे हम सताओल

रुधिर धार किआ मोर बहाओल

मांस खाओल किआ मोर रे।


कहलथि सद्गुरु सत्य कबीर

जम केर फ़ांस में पड़लै जीव

जनम सुधारो तोर हे।।

नयन नीर भरि रोए बकरिया......

........

साहेब बन्दगी-३🙏🙏🙏

चहुँ दिशि घिरल अन्हरिया

2:26:00 pm

चहुँ दिशि घिरल अन्हरिया


चहुँ दिशि घिरल अन्हरिया ओ बाबा

चहुँ दिशि घिरल अन्हरिया

कतौ ने देखी इजोरिया ओ बाबा

कतओ ने देखी इजोरिया


इंद्री कुटिल भाव मुस्काबय

माया ठगिनी बाण चलाबय

निशि दिन जग भरमाबय ओ बाबा


काम क्रोध के अगिन जराबै

लोभ मोह दिन रात सताबै

डरबै दुःखक बदरिया ओ बाबा


पंथ बतएलौं गुरू कृपा के

साधु संत चलथिन्ह जाहि बाटे

चललौं ताहि डगरिया ओ बाबा


काग जहाजक गति प्रभु मोरा

जाऊं कत, करू ककर निहोरा

शुभेश आब अहींक शरणियाँ ओ बाबा

हम सब अहींक शरणियाँ

🙏🙏🙏

उलझन (हिन्‍दी वर्जन)

2:23:00 pm

 उलझन


बड़ी उलझन में है मेरा मन,

तू तो जाने सब कुछ भगवन।

तू तो जाने सब कुछ भगवन।।


ज्ञान बोध से रहित जभी था,

भगवन तेरे निकट तभी था।

बचपन के मन की निर्मलता,

सुंदर सहज भाव शीतलता।।


निश्छल प्रेम बसा था भीतर,

सहज समर्पित सब कुछ तुम पर।

मन में कोई राग न द्वेष,

सहज प्रेम से पूरित भेष।।


बोध भावना आई जब से,

चित्त प्रदूषित हुआ है तब से।

पाप पुण्य की ढेरों उलझन,

कल-बल-छल में भर्मित ये मन।।


कोटि जतन करूँ निर्मल मन की,

आतम-राम के दिव्य मिलन की।

पर इन्द्री वश से निकलूँ कैसे,

माया मोह तजूं मैं कैसे।।


सदन कसाई की निर्मलता

पातकता में भी पवित्रता

पतित पावन हो मेरे स्वामी,

करो कृपा प्रभु अंतर्यामी।


माया मोह राग औ द्वेष,

काया जनित व्यथा औ क्लेश।

इनके बीच में कृपा विशेष,

मांगे तेरी शरण शुभेश।।

राम करे ऐसा हो जाए

2:20:00 pm

राम करे ऐसा हो जाए


राम करे ऐसा हो जाए।

कष्ट, व्याधि, दुःख सब मिटि जाए।।

दुःखी नहीं कोई जग में रहे अब।

सब कोई हर्षित, सुखमय हो सब।।

जो दुःख का होना हो जरूरी।

प्रभु तेरे चरणों से मिट जाए दूरी।।

तेरे चरणों की शरण में रहकर।

सुख दुःख जानूँगा मैं सम कर।।

इतनी कृपा बनाए रखना।

दोष बिसारि शरण में रखना।।

तेरी कृपा की आस है शेष।

कुटुंब सहित तेरे शरण शुभेश।।

🙏🙏🙏

दादी

1:52:00 pm

 दादी


जिसने बीज बोए रचनात्‍मकता के

भक्ति-भाव के और समता के

दीन-हीन के प्रति ममता के


निर्गुण भजनों की मधुराई

या रामायण की चौपाई

सार-शब्‍द सबके समझाती

भक्ति-प्रेम की पावन धारा

में हम सबको लेकर वो जाती


परम पूज्‍य श्रीयुत् गुरूवर के

सान्निध्‍य का दुर्लभ अवसर

करती जतन थी लाखों ऐसी

प्रभु की कृपा जो बरसें सब पर


प्‍यारी दादी बिनबौं तुझको

तेरी कमी है अंतरतम में

बस, श्रद्धा भाव हैं सजल नयन में

साहेब बन्‍दगी चरण कमल में

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

उलझन

1:50:00 pm

उलझन 


बड उलझन में अई हम्मर मन

तू त जानय सब किछु भगवन

तू त जानय सब किछु भगवन

बड उलझन में अई हम्मर मन


मन में नै छल दुनियादारी

हम्मर ओकर मारामारी

धिया पुता सन् मन छल निर्मल

नै किछ मन में छल-छिद्रम छल


निश्छल प्रेम भरल छल भीतर

सहज समर्पित तोहरे ऊपर

मन में किछुओ राग ने द्वेष

सहज प्रेम सौं पूरित भेष


बोध भावना आओल जखने

चित्त कलुषित भ गेल तखने

पाप-पुण्य केर कत्ते उलझन

कल बल छल में भर्मित भेल मन


कतेक जतन करि निर्मल मन लेल

मनुआ तरसै तोहरे चरण लेल

इन्द्री वश सँ निकली कोना

माया मोह तजी हम कोना


सदन कसाई केर निर्मलता

पावन मनुआ अओर सहजता

पतित पावन छी अहाँ स्वामी

करू कृपा प्रभु अन्तर्यामी


माया मोह राग आ द्वेष

काया जनित व्यथा ई क्लेश

सबके मेटि करू कृपा विशेष

माँगय अहाँक शरण 'शुभेश'

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

क्यों

1:48:00 pm

 क्यों


प्रभु हम सब तेरी संतति हैं

तुझ से ही पाते शक्ति हैं

पर कोई क्यों हरि हर द्रोही हैं

कुछ ही में क्यों तेरी भक्ति है


समरूप विराजो सब में तुम

सब ही तो फिर पुण्यात्मा हैं

फिर क्यों कर कोई कपटी द्वेषी

केवल कुछ साधु महात्मा हैं


इक तन से श्रमकण रिस रिस बहता

वो तन मन की पीड़ा सहता

फिर भी वो सुख से दूर है क्यों

हाँ कहो प्रभु,  मजबूर है क्यों


एक को तेरी ना कोई कदर

ना भक्ति भाव किया कहीं ठहर

कुत्सित व्यसन, सामिष भोजन

फिर भी सुख ने थामा दामन


तुम कहते भूखा भाव का हूँ

अति ही निर्मल स्वभाव का हूँ

पर निर्मल स्वभाव क्यों दीन दुःखी

कपटी द्वेषी क्यों परम् सुखी


होना तो बहुत कुछ चाहिए था

पर तेरा खेल निराला है

हम अपना चाहने वाले हैं

तू सबका चाहने वाला है


परिस्थितियां तो तेरे ही वश

केवल है कर्म हमारे वश

सत कर्म की अलख जगाता हूँ

बस इससे तुझे रिझाता हूँ


धन संपत्ति सौभाग्य कठिन

नहीं इससे मिटे क्लेश दुर्दिन

*प्रभु तेरी कृपा की चाह मुझे*

*बस रखियो अपनी राह मुझे*

..................... *शुभेश*

भगवन की थिक दोष हमर

1:46:00 pm

भगवन की थिक दोष हमर


भगवन की थिक दोष हमर

केहि अपराध नाथ बिसराओल

हम तँ जनम जनम केर सेवक

केहि अवगुण लेल नाथ सताओल


की कही हम कोना रहै छी

अहाँ विरह में कोना जीबै छी

अहाँ कखन धरि आँखि नुकायब

हमरा दिस सँ मुंह घुमायब

हमहुँ ढीठ बड़ पैघ अहीं सन

चौखट छोरि कतहुँ नहिं जायब

भगवन की थिक........


भेल होई जौं उलट कर्म किछु

सादर चरण में सब समर्पित

गुण अवगुण के बोध ने हमरा

जौं रहितए त भटकि तौं किआ

भवसागर में छी बौराअल

भगवन जूनि करू देर, राह देखाउ

भगवन की थिक........


सब प्रकार प्रभु समरथ अहाँ

लै दुखड़ा हम जाऊं कहाँ

बेरि बेरि अहाँ जांच जे ले लौं

नाम अहीं लै पार भेलौं

आब कृपा करू समरथ स्वामी

दोष बिसारि शरण लिअ स्वामी

भगवन की थिक.........


कण-कण में प्रभु अहीं छी व्यापल

तइओ आकुल नैन अभागल

सजल नैन रहे दिवस रैन प्रभु

आकुल मनुआ तनिको ने चैन प्रभु


दरस भेटत सब कष्ट कटत

सोचि मुदित आनंद मगन छी

अछि मतिमन्द सानंद 'शुभेश'

जूनि तरपाऊ करू कृपा विशेष।।

 

बुधवार, 5 जनवरी 2022

तिमिर घिरल घनघोर

8:21:00 am

 तिमिर घिरल घनघोर


तिमिर घिरल घनघोर

यौ मालिक..... तिमिर घिरल घनघोर।

आकुल मनुआ पंथ निहारै,

कहाँ छुपल अछि भोर।

यौ मालिक.... तिमिर घिरल घनघोर।।


अगम अथाहे भटकै मनुआ,

जिनगीक थाह नै पाबै मनुआ,

जाऊं कहां कित ओर ।

यौ मालिक.... तिमिर घिरल घनघोर।।


बुद्धि ज्ञान सब क्षीण भेल अइ,

माया मोह में लीन भेल अइ,

इन्द्री करै बड़ जोर।

यौ मालिक.... तिमिर घिरल घनघोर।।


भवकूपक अंधियार डराबै,

नयन अभागलि देखिए नै पाबै,

तनिको ने कतौ इजोत।

यौ मालिक.... तिमिर घिरल घनघोर।।


आब कृपा करू अंतर्यामी,

सर्व सहायी, समरथ स्वामी,

भव पसरल चहुँ ओर।

यौ मालिक.... तिमिर घिरल घनघोर।।


'शुभेश' अछि अधम पतित बड़ मालिक,  

अहीं शरण में अयलौं मालिक,

आस केवल अहिं ओर।

यौ मालिक.... तिमिर घिरल घनघोर।।


साहेब बन्दगी-३🙏🙏🙏

© शुभेश

रविवार, 24 नवंबर 2019

सुख—दु:ख दोऊ सम करि जानो

11:36:00 am
सुख—दु:ख दोऊ सम करि जानो


sukh-dukh

     'सुख' इसकी परिभाषा भिन्न—भिन्न हो सकती है। भूखे के लिए भोजन प्राप्ति, दरिद्र के लिए धन प्राप्ति, नि:संतान के लिए संतान प्राप्ति, धूप में खड़े व्यक्ति के लिए छांव की प्राप्ति वहीं ठंढ से ठिठुर रहे व्यक्ति के लिए धूप की प्राप्ति सुख हो सकती है।
    अर्थात विभिन्न अवस्थाओं में सुख की परिभाषा अलग—अलग है। तो क्या उपरोक्त वर्णित सुख वास्तविक सुख हैं अर्थात स्थायी हैं। भूखे को यदि भोजन की प्राप्ति हो जाए तो भूख के शांत होने तक ही वह भोजन उसके लिए सुखकारी है। यही स्थिति अन्य के साथ भी है। वास्तविक सुख तो शांति की प्राप्ति है। शांति से परमानंद की प्राप्ति होती है और वही सच्चा सुख हो सकता है।
     तो शांति कैसे सम्भव है, इसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है। शांति की प्राप्ति में 'संतोष' अत्यंत सहायक होता है। मैं बचपन से ही सदैव प्रार्थना किया करता था—       
     हे परम पूज्य गुरूदेव जू,
                         कीजै कृपा रहे शांत मन ।
     नहिं चाहिए मुझे और कुछ,
                         प्रभो दीजिए मुझे 'संतोष' धन ।।

    'संतुष्टि के भाव' मन को शांत करते हैं। इसमें भगवत सुमिरन बहुत सहायक होता है। भगवत भजन से अंत:करण शुद्ध होता है और चित्त शांत होता है जो कठिन—से—कठिन परिस्थितियों में भी मन:स्थिति को मजबूती प्रदान करता है और विपरीत समय से उबरने की शक्ति प्रदान करता है।

     श्रीरामचरितमानस के सुंदरकाण्ड में श्रीहनुमान जी कहते हैं—
          कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई ।
          जब तव सुमिरन भजन न होई ।।
     अर्थात बिपति (दु:ख) की स्थिति वो है जब आपका (प्रभु का) सुमिरन भजन नहीं हो।

     संत कबीर साहेब कहते हैं—
          दु:ख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय ।
          ज्यों सुख में सुमिरन करे, तो दु:ख काहे होय ।।
     अर्थात, दु:ख की अवस्था में भगवान का भजन तो सभी करते हैं, परंतु भगवान जब कृपा करके दु:ख दूर कर देते हैं तो फिर उन्हें भूल जाते हैं। यदि सुख के समय में, नियमित रूपेण भगवत सुमिरन की जाए तो दु:ख क्यों कर हो।

     देखा जाए तो सुख और दु:ख दोनों मात्र एक अवस्था है। इसे एक समान भाव से जो लेता है वही परम शांति को प्राप्त कर सकता है। अर्थात जब सुख की प्राप्ति हो तो अभिमान नहीं करना चाहिए और इसे भगवान की कृपा दृष्टि मानकर सहर्ष स्वीकार करनी चाहिए। उसी प्रकार दु:ख की स्थिति में भगवान की दी हुई परीक्षा मानकर इसमें सफल होने के लिए भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए।
     गुरूनानक साहिब कहते हैं—
          सुख कउ मांगै सभु को, दु:खु न मांगै कोइ ।
          सुखै कइ दु:खु अगला, मनमुखि बूझ न होइ ।
          सुख दु:ख सम करि जाणी अहि सबदि भेदि सुख होइ ।।

     सुख—दु:ख से परे होकर भगवत भजन करने से आत्मिक शांति की प्राप्ति होती है और चित्त भगवान के समीप होता है। गुरूनानक साहिब का यह भजन इसको और स्पष्ट करता है—
          साधो मन का मान तिआगो ।
          काम क्रोध संगत दुरजन की, ताते अहनिस भागो ।।
          सुख दु:ख दोनों सम करि जानै, और मान अपमाना ।
          हरष सोग ते रहे अतीता, तिन जग तत्व पछाना ।।
          असतुति, निंदा दोऊ त्यागे, खोजै पद निरबाना ।
          जन 'नानक' यह खेल ​कठिन है, कोऊ गुरमुख जाना ।।
         
     अर्थात सुख—दु:ख को समान जानते हुए उसमें बिन विचलित होते हुए जो भगवत सुमिरन करते हैं उन्हें ही परमानंद की प्राप्ति होती है।

गुरुवार, 5 सितंबर 2019

शिक्षक दिवस पर सभी गुरूजनों को कोटि—कोटि वंदन

8:08:00 am
teachers-day

आज शिक्षक दिवस है अर्थात अपने गुरूजनों को स्मरण करने का पावन दिवस। यूं तो कभी भी उन्हें विस्मृत करने का प्रश्न ही नहीं उठता, अपितु एक दिन ऐसा हमें मिला है जिस दिन हमें उन्हें स्मरण कर उनके सुकृत्यों, दीक्षाओं से सीख ले सकते हैं, जीवन के बाधाओं से लड़ने हेतु पुन: प्रयासरत हो सकते हैं।

मेरा यह सौभाग्य है कि मुझे भी अपने जीवन में कदम—कदम पर ऐसे गुरूजनों का अनुग्रह प्राप्त हुआ जिन्होंने मुझे एक नई दिशा दी। सर्वप्रथम गुरू स्वाभाविक रूप से प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में उनके माता—पिता होते हैं। मेरे जीवन में भी मेरी मॉं और पापा ने प्रथम गुरू की उल्लेखनीय भूमिका निभाई। आज मेरे विचारों में थोड़े—बहुत जो भी सत् गुण रूपी भाव विराजमान हैं, वह उनके ही सीखों का परिणाम है। गणित के कठिन—से—कठिन सूत्र हों अथवा संस्कृत के धातु रूपों को उनको सरलतम रूप में समझा कर कंठाग्र कराना सब पापा के शिक्षाओं का ही परिणाम है। बचपन में एक बार मुझे घर से पैसे निकालकर चॉकलेट—बिस्किट खाने की आदत लग गयी थी। पापा जानकर अत्यंत व्यथित हुए, परंतु उनके समझाने के तरीके ने न मेरी आदत छुड़ाई बल्कि मनोवैज्ञानिक रूप से गहरा प्रभाव भी डाला। हाथ उठाने के स्थान पर उनका आंखें दिखाना अथवा आंखें फेर लेना ही काफी होता है। कहा भी गया है: मातु—पिता ही प्रथम गुरू होते हैं। उन्हें सप्रेम साहेब—बन्दगी।

इसके बाद प्राथमिक विद्यालय के जगन्नाथ सर, रामरेखा सर, पाण्डेय सर हों या कुमुद चाची। उन्होंने जीवन पथ पर आगे बढने में जो ज्ञान रूपी बीज बोये उनके लिए हृदय की गहराईयों से आभार और वंदन। फिर माध्यमिक विद्यालय के गयासुद्दीन सर, रवीन्द्र सर, देवेन्द्र सर, नारायण सर, कुंवर सर और हरिवंश सर ने इन बीजों को अंकुरित करने के लिए ज्ञान रूपी जल से मुझे भली—भांति सींचा, उनको सादर वंदन। उच्च माध्यमिक विद्यालय में शारदानन्द सर, अनिरूद्ध सर,  निराला सर, बलदेव सर आदि अनेकों शिक्षकों ने मुझ जैसे अनेकों शिक्षार्थियों के ज्ञान के पौधे को साकार रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उनकों आत्मिक आभार।
आदरणीय दिलीप सर और दिनेश सर ने मेरे शैक्षणिक जीवन को प्रगति पथ पर गतिशील करने में  बहुत सहायता की उनको सादर प्रणाम। 

आज भी मुझे याद है, जब मेरी बोर्ड परीक्षा का परिणाम पेण्डिंग लिस्ट में आया था, मेरा रो—रोकर बुरा हाल था। उस समय आदरणीय दिनेश सर ने आगे बढने की प्रेरणा देते हुए मुझे हिम्मत दिया था जिसे मैं कभी भी नहीं विस्मृत कर सकता। सदैव की तरह संकोची प्रवृति का होने के कारण मैं कभी भी अपनी भावनाओं को उनके सम्मुख अभिव्यक्त न कर पाया।  कभी भी अनजाने में मुझसे हुई भूल के लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूं। उन्हें हार्दिक वंदन।

मुझे प्रतियोगी जीवन में सफल बनाने हेतु ज्ञान के नव अंकुर डालने वाले आदरणीय संतोष सर का उल्लेख किये बिना मेरा निवेदन अधूरा ही रहेगा। उन्होंने अपने सरल—स्वाभाविक तरीकों से समझाकर मुझे प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता प्राप्त करने में सहायता प्रदान की। उन्हें हार्दिक वंदन।

मेरे छोटे—बड़े भाई, मित्र, जीवन संगिनी और मेरी बेटी से भी मुझे बहुत—कुछ सीखने को मिला। इसलिए ये भी आदरणीय हैं और इस अवसर पर मैं इन्हें भी नमन करता हूं। कार्यालयीन जीवन में आदरणीय मिथिलेश सर, बलविन्‍दर सर, देवेन्‍द्र सर, देवराज सर, वीणा मैडम, आदि अनेकों श्रेष्‍ठजनों ने गुरू की भूमिका निभाई। आज के दिन मैं उन्‍हें भी नमन करता हूं।

मेरे धार्मिक जीवन को दृढ कर नई दिशा देने हेतु मुझ पर अत्यंत कृपालु करने वाले प्रात: स्मरणीय परम पूज्य गुरूदेव मालिक बाबा ने मुझे दीक्षा देकर मेरे अनेकों जन्मों के सुकृत्यों का सुफल दिया और जीवनमार्ग में आने वाली बाधाओं के निदान हेतु मार्ग खोल दिये। उनको कोटि—कोटि वंदन। सप्रेम साहेब—बन्दगी। मैं सदैव उनका ऋणी रहूंगा।

आप सभी गुरूजनों को कोटि—कोटि वंदन।

गुरू: ब्रह्मा गुरू: विष्णु, गुरू: देवो महेश्वर: ।
गुरू: साक्षात् परम् ब्रह्म:, तस्मै श्री गुरूवे नम: ।।
.............................................................शुभेश

रविवार, 5 मई 2019

परम पूज्‍य सद्गुरूदेव श्रीयुत् बौआ साहब जू का पावन अवतरण दिवस

8:54:00 am
परम पूज्य सद्गुरूदेव श्रीयुत् बौआ साहब जू के पावन अवतरण दिवस पर सबों को सप्रेम साहेब बन्‍दगी
Baua-sahab-बौआ-साहब

प्रात: स्मरणीय परम पूज्य सद्गुरूदेव श्रीयुत् बौआ साहब जू के पावन अवतरण दिवस पर उनके श्री चरणों में साहेब बन्दगी —3.

 आज ही के दिन वर्ष 1926 में सद्गुरूदेव जू ने मिथिला क्षेत्र में दरभंगा शहर से लगभग 28 किलोमीटर दूर भरवाड़ा ग्राम में परम पूज्य श्री गिरिवर लाल जू जो मिर्चाई लाल के नाम से विख्यात थे, के घर जन्म लिया था।
मिथिला क्षेत्र में संत कबीर साहेब के सदुपदेशों को जन—जन तक पहुंचाने का पावन कार्य उन्होंने हीं प्रारम्भ किया था। श्रीयुत् बौआ साहब जू ने उनके इस पावन कार्य को सम्पूर्ण भारतवर्ष में प्रसारित करने और दीन—दु:खियों की सेवा करने में अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।

उनका आकर्षक व्यक्तित्व व अंतरतम को शीतल कर देने वाली तेजस्वी वाणी सभी का मन मोह लेती थी। अनायास ही सभी उनकी ओर खिंचे चले आते थे। अनुज श्री शिवेश की रचना उनके व्यक्तित्व का सजीव चित्रण आंखों के सामने प्रस्तुत करती है —

अजब निराले सतगुरू मेरे, चलो दर्शन कर आते हैं ।
ज्ञान—प्रेम की अविरल धारा, चलकर खूब नहाते हैं ।।
अजब निराले सतगुरू .................

भव्य ललाट और बाल सुनहरे, देख मुग्ध हो जाते हैं ।
सतगुरू की मूरत को लखकर, मिलकर शीश झुकाते हैं ।।
अजब निराले सतगुरू ................

हम सब मिलकर ऐसे गुरू की, नित दिन वन्दन करते हैं ।
वचनामृत सुनकर हम उनके, धन्य स्वयं को करते हैं ।।
अजब निराले सतगुरू ................
(शिवेश)

सचमुच हम उनके वचनामृत सुनकर स्वयं को धन्य मानते थे। आज भी उनके शब्दों की प्रतिध्वनि कानों में गूंजती रहती है। अनकों जन्मों के सुकृत्य का ही फल होगा कि इस जन्म में उनसे साक्षात्कार हुआ। परम प्रभु की कृपा का क्या बखान करूं उन्होंने न केवल उनके विशाल परिवार का अंग बनाया, साथ ही उनके शिष्य बनने का सौभाग्य भी प्रदान किया।

बचपन में स्कूल से वापसी में कई बार सीधे उनकी कुटिया पर चला आता था। उस समय हमारे बाल सुलभ प्रश्नोें के उत्तर देते हुए भी वो कई गूढ बातों को बड़ी सहजता से समझा देते थे। कुटिया में सद्गुरू कबीर साहेब की एक बड़ी तस्वीर रखी थी। सायंकाल में प्रार्थना के समय उस कमरे में बस एक दीप जलता रहता था। कोई फूल माला, प्रसाद, आरती कुछ भी नहीं। सब कोई प्रार्थना करते और अंत में एक—दूसरे को साहेब बन्दगी करते। कबीर साहेब की तस्वीर की पूजा न कर हमलोग बस प्रार्थना करते तब यह बात मेरे सामान्य दिमाग में नहीं बैठती थी। सामान्यतया मंदिरों में तस्वीर की ही पूजा होती थी। आस—पास हर जगह यही देखता परंतु कुटिया में ऐसा नहीं था। ऐसे ही एक दिन स्कूल से जब वापसी में कुटिया पहुंचा तो अपनी जिज्ञासा जाहिर कर दी कि इस तस्वीर में भगवान नहीं हैं क्या। बाबा ने समझाते हुए कहा तस्वीर में हीं क्यों हर जगह भगवान हैं। आपमें हममें निर्जीव सजीव सबमें भगवान हैं। फिर तस्वीर की पूजा क्यों नहीं करते, जैसे और मंदिरों में होता है। बाबा मुस्कुराते हुए उत्तर देते हैं कि जब हर जगह भगवान हैं तो केवल इस तस्वीर की ही पूजा क्यों। संसार का ऐसा कोई कण और क्षण नहीं जो भगवान से अलग हो। सर्वत्र भगवान विराजते हैं। आवश्यकता है तो उनको याद करने की पुकारने की। पूजा—पाठ और आडम्बर तो स्वयं को दिखाने के लिए है। उससे आप खुद को समझा सकते हैं कि आप भगवान को याद करते हैं। भगवान को समझाने के लिए तो हृदय की गहराईयों से पुकार निकलनी चाहिए। जब आप सच्चे मन से ध्यान करेंगे तब जहां हैं वहीं भगवान सम्मुख होंगे। इसलिए नियमित रूप से मन लगाकर प्रार्थना तो करनी ही चाहिए, बाह्य आडम्बरों की कोई आवश्यकता नहीं।

मैंने अभी अभी विज्ञान में पढा था कि जगदीश चन्द्र बसु जी ने खोज निकाला था कि पेड़—पौधों में भी जान होता है। तबसे हमारे साथियों ने जो कि सामिष भोजी थे, हमें चिढाना शुरू कर दिया था कि तुम तो नाम के शाकाहारी हो शाक—सब्जी में भी जान होता है अब क्या खाओगे। मैं परेशान, पापा से पूछा। पापा ने समझाया कि शाकाहारी मतलब शाक का आहार करने वाला अर्थात जो शाक सब्जी खाता हो। इसलिए हम सब शाकाहारी हैं। परंतु मैं पूरी तरह संतुष्ट नहीं हुआ तो पापा बोले मालिक बाबा से ही पूछना वो ही समझाएंगे। फिर मैं दादी के साथ कुटिया पर पहुंचा। बाबा को बंदगी बजाने के बाद अपनी समस्या बतायी कि सब दोस्त हमको परेशान करता है। किताब में भी लिखा है और सर भी पढाये हैं, मैं उन्हें क्या जवाब दूं।

बाबा पहले मुस्कुराये फिर बोले कि बोलने वाले ऐसे ही बोलते हैं आप उनकी बातों पर मत जाओ। जो मांसाहार का त्याग नहीं कर सकते वो अनेक कुतर्क करेंगे, वे आप जैसा नहीं बन सकते इसलिए आपको चिढाते हैं, आप ध्यान मत दो। 
मैं बोला— नहीं बाबा मुझे तो जवाब देना है। आप बताइये कि जब पेड़ पौधों में भी जान है तो हमलोग क्या खाएंगे।
बाबा बोले आप नहीं मानेंगे, तो सुनिये— भगवान ने सभी जीवों के लिए आहार निश्चित किया है और उसी के अनुरूप उसके शरीर का निर्माण किया है। हम सभी मनुष्य स्वभाव और शरीर से शाकाहारी हैं। मांसाहारी जंतुओं में एक विशेष दांत रदनक जो चीड़ने—फाड़ने का काम करता है वो पाया जाता है। मनुष्यों में यह नहीं होता। अर्थात हम सब शाकाहारी हैं। मनुष्य केवल अपनी जिह्वा के कारण मांसाहारी है और जीव हत्या का महापाप करता है। जहां तक शाक सब्जी में जान होने की बात है तो शाक सब्जी में जीवात्मा का स्वरूप सुसुप्तावस्था में रहता है। इसका स्वरूप ही ऐसा बनाया गया है।
कबीर साहेब कहते हैं कि दया राखि धरम को पाले, जग से रहे उदासी। अपना सा जी सबका जाने ताहि मिले अविनाशी।। अर्थात जो अपने समान ही सबको समझता है उसे ही ईश्वर मिलते हैं। अब आप स्वयं सोचिए कि जिनके दिल में दया होगी वह किसी की हत्या करेगा। जो अपने पुत्र के समान और जीव जंतुओं के पुत्रों को समझेगा तो जीवहत्या ही नहीं करेगा।

मैं परम पुरूष परमात्मा का हृदय की गहराईयों से आभार प्रकट करता हूं कि उन्होंने हमें परम पूज्य सद्गुरूदेव जू से मिलवाया। उनकी कृपा दृष्टि का क्या कहना। एक छोटा सा सजीव चित्रण प्रस्तुत करता हूं— पापा एक बार अत्यधिक अस्वस्थ हो गए। आंत में सूजन होने की शिकायत के कारण उन्हें दरभंगा में नर्सिंग होम में भर्ती होना पड़ा। बाबा उस समय सुबह—सुबह नर्सिंग होम में पापा से मिलने आए। उस समय पापा बेड पर ही दीवार के सहारे बैठे थे। उन्हें उठने—बैठने में दिक्कत हो रही थी। बाबा के आने पर हम सबने तो उनकी बंदगी कर ली, परंतु पापा उठ नहीं पा रहे थे। उनकी आंखों से आंसू बह निकले। उस समय कृपानिधान सद्गुरूदेव की असीम अनुकम्पा देखने को मिली। वो खड़े हो गए और अपना दायां पैर उठाकर पापा के हाथ के पास बढा दिया और पापा ने सहजता से बन्दगी कर ली। इस असीम अनुकम्पा से अभिभूत हो हम सबकी आंखों से अश्रुधार बह निकले।

मालिक बाबा की कृपा दृष्टि ही है कि इतनी कम उम्र में ही मेरी पुत्री सुश्री शुचि जिसे मैंने एक बार कभी समझाया था कि सब जगह भगवान होते हैं और सबमें भगवान होते हैं। इस बात को उसने इतनी गहराई से लिया कि सबको कहती फिरती है पता है तुममें भी भगवान है, हम में भी भगवान है वो सबकुछ देखते हैं। जब कुछ दिक्कत होता है उसे, बस हाथ जोड़कर भगवान को याद करने लगती है।
मालिक बाबा के सदुपदेशों को सदैव सामने रखकर मैं आचरण करने की कोशिश करता हूं और इस भवसागर में अपनी नैया को पार लगाने का प्रयास करता हूं। कभी कभी सोचता हूं कि मालिक बाबा का अनुग्रह नहीं प्राप्त हुआ होता तो पता नहीं इस भवसागर में कितनी बार अंधकूपों में भटक गया होता। परम पुरूष परमात्मा को कोटि—कोटि धन्यवाद।

नमन तुम्हें शत बार है गुरूवर, नमन तुम्हें शत बार है ।
पाप—पुण्य का भेद कराया,
दया धरम का मार्ग दिखाया ।
स्नेह भरा जो हाथ फिराया, कोटि—कोटि आभार है ।।
नमन तुम्हें शत बार है......................
सत की नाव में मुझे बिठाया,
नाम रूपी पतवार थमाया ।
निराकार का भेद बताया, वो रूप तेरा सा​कार है ।।
नमन तुम्हें शत बार है......................
क्रोध—लोभ को पास न लाना,
माया मोह से बच के रहना ।
माया ठगिनी बड़ी सयानी, तूने किया खबरदार है ।।
नमन तुम्हें शत बार है......................
हम अज्ञानी इंद्रिय वश में,
बंधते जाते भव बंधन में ।
तूने ज्ञान की ज्योति जलाकर,
तन और मन दोनों धुलवाकर ।
आतम—राम का मिलन कराकर, किया बड़ा उपकार है ।।
नमन तुम्हें शत बार है.....................
शुभेश विनवत बारम्बार है...................
नमन तुम्हें शत बार है.....................

साहेब बन्दगी!! साहेब बन्दगी!! साहेब बन्दगी!!

मंगलवार, 6 नवंबर 2018

मॉं लक्ष्‍मी तेरी जय हो

11:50:00 am
maa-laxmi-shubh-diwali


दीपावली अर्थात़ दीपोत्सव
तिमिर से प्रकाश की ओर सभी उद्यत
हे मॉं मैं भी भटक रहा भवकूपों में
तुझे जानकर भी अनजान बना रहा मैं

अपनी तैंतीस वर्षीय आयु में सभी
तैंतीस कोटि देवताओं में तेरी महिमा पहचान गया
तुझ बिन सकल गुण निरर्थक
सभी श्रम बेकार, बस तेरी महिमा है अपार, मान गया

मान गया मॉं, मान गया
सब कुछ पहचान गया मॉं पहचान गया
क्षमाप्रार्थी हूं मॉं, कभी तेरी पूजा नहीं की
मॉं सरस्वती के भाव में बहता रहा, प्रीत दूजा नहीं की

तेरी कृपा से मॉं सभी तर जाते हैं
जितने भी दुःख हों, सभी कट जाते हैं
तेरी कृपा हो तो सभी अवगुण
गुण में परिवर्तित हो जाते हैं

मैं सादगी के चक्कर में पड़ा रहा मॉं, हमें माफ करना
इतना भी न समझ सका धवल वस्त्र पर
हल्की सी कजरी भी कोसों दूर तक नजर आती है
और लोगों को पूरे श्वेत वस्त्र नहीं
बस वो कजरी ही दिख पाती है

खैर मैं तो अज्ञानी हूं, मुझे माफ करना
चहूं ओर से निराष हो थक गया हूं शरण लेना
मॉं मुझे कुछ अधिक की आस नहीं
बस इतनी कृपा करना, बनूं मैं स्वयं का परिहास नहीं

सत्कर्म की शक्ति देना, सेवा-भाव भक्ति देना
उचित फल प्राप्ति देना, सकल परिवार समृद्धि देना
मातु-पिता के चरणों में भक्ति देना
संगिनी की शक्ति देना

संतति और बांधवों का सम्बल बनूं
सकल परिवार में स्नेह रस भरूं
हे मॉं लक्ष्मी, वैष्णवी शरण रखना
दोष क्षमाकर, सदैव कृपा करना

गुरुवार, 18 अक्तूबर 2018

संत कबीर के विचार -आज कितने प्रासंगिक

6:56:00 pm
संत कबीर के विचार -आज कितने प्रासंगिक

भारत की पावन वसुंधरा अनेकों महान साधु - संतों की जननी रही है, जिन्‍होंने अपने पावन जीवन-दर्शन  से भारत  ही  नहीं सम्‍पूर्ण विश्‍व को लाभान्वित किया है। ऐसे ही संतों की श्रेणी में अग्रणी नाम परम तेजस्‍वी संत कबीर का है।  इस धरा-धाम पर संत कबीर  का  पदार्पण  ऐसे समय  में  हुआ जब एक ओर तो भारतीय जनमानस हिन्‍दू धर्म में गहरी पैठ बना चुके आडम्‍बरों व कुप्रथाओं से लड़ रहा था, वहीं दूसरी ओर आततायी लोदी शासकों के अन्‍याय और जबरन धर्म-परिवर्तन का शिकार हो रहा था। 
विभिन्‍न विद्वानों-इतिहासकारों के अनुसार संत कबीर का जन्‍मकाल 1398 ई. के आस-पास था। वे सैय्यद और लोदी शासकों के समकालीन थे। संत कबीर के जन्‍म के सम्‍बंध में कबीर-पंथियों में एक दोहा प्रचलित है-

चौदह सौ पचपन साल गए, चन्‍द्रवार एक ठाठ ठए ।
ज्‍येष्‍ठ सुदी बरसाईत को, पूरनमासी प्रकट भए ।।

अर्थात् संत कबीर का प्राकट्य काल विक्रमी संवत 1455 संवत ज्‍येष्‍ठ मास के पुर्णिमा के दिन हुआ था। कबीर ने सदैव दया और प्रेम जैसी मानवतावादी भावों को अपने विचारों में अधिक स्‍थान दिया है-

दया राखि धरम को पाले, जग से रहे उदासी ।
अपना सा जी सबका जाने, ताहि मिले अविनाशी ।।

जहां दया, तहां धर्म है, जहां लोभ तहां पाप ।
जहां क्रोध तहां काल है, जहां क्षमा वहां आप ।।

जीवन की सत्‍यता का बोध कराने के लिए उन्‍होंने प्रभावशाली अभिव्‍यक्ति दी है जो उनके साखियों में स्‍पष्‍टत: परिलक्षित होता है –
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोय ।
जो दिल खोजा आपना, मुझ-सा बुरा न कोय ।।

चुन-चुन तिनका महल बनाया, लोग कहें घर मेरा ।
ना घर मेरा, ना घर तेरा, चिडि़या रैन बसेरा ।।

हाड़ जड़े ज्‍यों लाकड़ी, केस जड़े जस घास ।
पानी केरा बुलबुला, अस मानुष की जात ।।

पानी ही ते हिम भया, हिम होय गया बिलाय ।
जो कुछ था सोई भया, अब कुछ कहा न जाय ।।

कबीर दिखावटी प्रेम के स्‍थान पर आंतरिक प्रेम और लौकिक प्रेम के स्‍थान पर परमात्‍मा के प्रति निश्‍छल प्रेम को प्रमुखता देते हैं। उनके अनुसार प्रेम सर्वत्र है -

प्रेम न बाड़ी उपजै, प्रेम न हाट बिकाय ।
राजा परजा जेहि रूचै, शीश देइ लै जाय ।।

जब मैं था, तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहिं ।
प्रेम गली अति सांकरी, ता में दोउ न समाय ।।

बाहर क्‍या दिखलाइए, अंतर जपिए राम ।
कहां काज संसार से, तुझे धनी से काम ।।

कबीर अपने साखियों में मानव जीवन के यथार्थ से भी परिचय कराते हैं और जीवनरूपी नाव को खेने का ढंग भी सिखलाते हैं-

कबिरा गर्व न कीजिए, कबहुं न हंसिए कोई ।
अजहुं नाव समुद्र में, ना जाने का होई।।

जो तोकूं कांटा बुवै, ताहि बोय तू फूल ।
तोकू फूल के फूल है, वा कू है तिरशूल ।।

निन्‍दक नियरे राखिये, आंगन कुटी छवाय ।
बिन पानी साबुन बिना, निरमल करे सुभाय ।।

वृक्ष कबहुं न फल भखै, नदी न संचै नीर ।
परमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर ।।

संत कबीर तन की शुद्धता के स्‍थान पर मन की शुद्धता को अधिक महत्‍व देते हैं-

नहाए धोय क्‍या हुआ, ज्‍यों मन मैल न जाय ।
मीन सदा जल में रहै, धोये बास न जाय ।।

संत कबीर ने धर्म के नाम पर हो रहे आडम्‍बरों का कड़ा विरोध किया और विभिन्‍न कुप्रथाओं पर आमजनों की भाषा में ही आघात किया –

पाथर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूं पहाड़ ।
ता से तो चक्‍की भली, पीस खाय संसार ।।

हिन्‍दू-तुरूक की एक राह है, सतगुरू इहै बताई ।
कहहि कबीर सुनहु हो सन्‍तों, राम न कहेउ खुदाई ।।

कबीर दिखावटी स्‍वांग को त्‍याग कर निर्मल हृदय से भगवत भजन की सलाह देते हैं –

कबीर जपनी काठ की, क्‍या दिखलावे मोहि ।
हृदय नाम न जापिहें, यह जपनी क्‍या होहि ।।

पिया का मारग सुगम है, तेरा भजन अवेड़ा ।
नाच न जानै बापुड़ी, कहता आंगन टेढ़ा ।।

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।
कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर ।।

वर्तमान समय भी कुछ अलग नहीं है। निरंतर धर्म के नाम पर हो रही हिंसा और अंधविश्‍वास की भेंट चढ रही मानव जिन्‍दगियों को देख लगता है कि हमने संत कबीर के विचारों को पूरी तरह विस्‍मृत कर दिया है। संत कबीर केवल धार्मिक सुधारक ही नहीं थे, उनके विचारों ने समाज को एक नई दिशा दी। उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक है। उन्‍होंने मानव को जीवमात्र से प्रेम करना सिखलाया। बाह्य आडम्‍बरों को सिरे से नकारते हुए सच्‍चे मन से भगवत भजन की सलाह दी। 
 ओ३म्  ।।    शांति:    ।।    शांति:    ।।    शांति:    ।।

हे प्रभु - निवेदन

6:39:00 pm
हे प्रभु - निवेदन

हर भेष में तू, सब देश में तू
कण-कण में तू ही, हर क्षण में तू ही
तुम राग में हो, अनुराग में हो
तुम प्रीत, प्रेम और त्‍याग में हो

तुम मातु-पिता, तुम बन्‍धु-सखा
तुम सन्‍यासी, तुम जोग-जती
प्रभु राम तू ही, और कृष्‍ण तू ही
गौतम-महावीर-नानक तूम ही

तुम सूर तुलसी और मीरा हो
जन-जन का मान कबीरा हो
कर्म तू ही, सब धर्म तू ही
जीवन के सारे मर्म तू ही

घट बाहर भी, घट भीतर भी
घट में बसो, सब घट में रमो
सब जीव में तुम समदरशी हो
सुख-दु:ख में सदा मन हरषी हो

सर्वत्र तू ही, सर्वज्ञ तू ही
ज्ञान तू ही, मर्मज्ञ तू ही
तुम दूर नही, तुम पास में हो
तुम आस में हो विश्‍वास में हो

हम जाएं कहां कुछ भान नहीं
कहें कष्‍ट किसे कुछ ज्ञान नहीं
सर्वत्र तू ही, फिर कष्‍ट है क्‍यूं
सर्वज्ञ तू ही, फिर मौन है क्‍यूं

प्रभु मैं अज्ञानी हूं शायद
कुछ मान-गुमान हमें शायद
तुम पुत्र जानि हमें माफ करो
हमको अब भव से पार करो

अब और नहीं कुछ तृष्‍णा शेष
विनती कर जोडि़ करै ‘शुभेश’

प्रभु कब तक यूँ ही तरपाओगे

6:27:00 pm
प्रभु कब तक यूँ ही तरपाओगे

प्रभु जी, प्रभु जी ओ प्रभु जी
प्रभु कब तक यूँ ही तरपाओगे
नयन मूँद कर, हमसे रूठकर
कब तक हमें तुम सताओगे
प्रभु जी, ओ प्रभु जी......
मेहनत की नही है मानो कदर
भटकते रहे हम, हो दर-ब-दर
जहां से चले थे फिर पहुंचे वहीं
कब तक बता दो है केशव हमें,
पेंडुलम की तरह यूँ घुमाओगे
प्रभु जी, हे प्रभु जी..............
अकेला शहर में, मैं तन्हा डगर में
कर्मभूमि में भी अकेला खड़ा हूँ
तूने जो मुंह फेर ली हमसे माधव
घर हो या बाहर नियति से लड़ा हूँ
कोई कर्म के वश, कोई धर्म के वश
हमारी नियति भी कहाँ अपने है वश
प्रभु जी, ओ प्रभु जी...........
मेरा मर्म जाने, जगत में न कोई
हाँ मैं मानता हूँ, ये सब जानता हूँ
दिखाते हो तस्वीर तुम जिसको जैसे
समझता उसे सच है बिल्कुल ही वैसे
पर दोष किसका जो छवि देखता है?
या दोष तेरा जो सर्वज्ञ हो, मुँह फेरता है?
हम तन्हा तेरी राहों में खड़े हैं
हे केशव, कृपा बिन विकल हो रहे हैं
प्रभु जी, हाँ प्रभु जी.....................
कर्म कुछ विकट हमने शायद किये हों
तभी तो हे राघव नयन मूंदते हो
क्षमाप्रार्थी हूँ हे सर्वज्ञ केशव
उचित ही करोगे जानता हूँ मैं माधव
वो घड़ी आएगी कब बता दो हे राघव
जब तुम्हारी सुदृष्टि पड़ेगी हम सब पर
वो दृष्टि तुम्हारी जो कल्याणकारी
सकल दुःख-विपदा पर पड़ती जो भारी
प्रभु जी, ओ प्रभु जी....................
शुभेश करें विनती हे प्रभु जी, प्रभु जी
हम सबको तू अपना, हाँ अपना ही समझो
विपत्ति की कितनी कठिन ही घड़ी हो
दया-दृष्टि हम पर सदा रख ही परखो
हे प्रभु जी, हाँ प्रभु जी, ओ प्रभु जी

रविवार, 5 अगस्त 2018

हे प्रभु

4:57:00 pm
हे प्रभु
he-prabhu

हर भेष में छी, सब देश में छी
कण—कण में अहाँ, हर क्षण में अहीं
अहाँ राग में छी, अनुराग में छी
अहाँ प्रीत प्रेम और त्याग में छी
अहिं मातु—पिता, अहिं बन्धु—सखा
अहिं सन्यासी, अहीं गृहस्थी
प्रभु राम अहीं, अहिं कृष्ण भी छी
अहिं गौतम, महावीर, नानक भी छी
अहाँ सूर—तुलसी आ मीरा छी
अहाँ जन—जन केर मान कबीरा छी
कर्म अहीं, सब धर्म अहीं
जीवन केर सबटा मर्म अहीं
घट बाहेर भी, घट भीतर भी
घट—घट में रमी, हर घट में बसी
सब जीव में छी, समदरशी छी
सुख—दु:ख में अहाँ मन हरषी छी
सर्वत्र अहाँ सर्वज्ञ अहीं
ज्ञान अहाँ मर्मज्ञ अहीं
अहाँ दूर भी छी, अहाँ पास भी छी
अहाँ आस में छी, विश्वास में छी

हम जाउ कत' किछु नै बूझाए
कहि कष्ट कत' किछु नै सूझाए
सर्वत्र अ​हीं फेर कष्ट किआ
सर्वज्ञ अहाँ फेर दु:ख किआ

प्रभु हम अज्ञानी बुझि परए
किछु कर्म उलट जौं भेल होअए
पुत्र जानि अहाँ माफ करू
हमरो भवसागर पार करू
आओर हमरा इच्छा किछिओ ने शेष
विनती कर जोड़ि करै 'शुभेश'

बड़की दादी - गुरू मॉं

4:54:00 pm
बड़की दादी
barki-dadi-guru-ma

सहज शांत तेजोमयी सूरत ।
ममतामयी जगदम्बा की मूरत ।।
निर्मल ह्रदय, करूणामय दृष्टि ।
अविरल स्नेह से सींचत सृष्टि ।।

गुरू मॉं की तो छवि है ऐसी ।
स्वयं विराजे गुरूवर जैसी ।।
साहेब बन्दगी चरण कमल में ।
श्रद्धा—भाव हैं सजल नयन में ।।

तुम सम कौन कहूं उपकारी ।
जो आवे कुटिया दु​:खियारी ।।
मातृत्व स्नेह की बारिश करती ।
पल में उनकी पीड़ा हरती ।।

गुरूवर के साधना—पथ की तुम,
अविचल औ निर्भीक संगिनी ।
दया—धरम का पाठ पढ़ाती,
भव—भय दूर कराती जन की ।।

माई साहब, बड़की काकी और बड़की दादी,
केवल नाम नहीं श्रद्धा है ।
कोटि—कोटि वंदन चरणों में,
जन—जन की पावन आस्था है ।।

शुभेश करतु हैं बंदगी,
बिनवौं बारम्बार ।
बड़की दादी दया करो
विनती करो स्वीकार ।।

रविवार, 22 जुलाई 2018

मालिक बाबा

1:26:00 pm
मालिक बाबा
(परम पूज्य बौआ साहब जू)

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'मालिक बाबा' बचपन में यह नाम सुनते ही रोमांच भर जाता था। अभी भी इस नाम—मात्र से एक विलक्षण उर्वरा शक्ति का विकास हो जाता है।
मुझे आज भी बचपन की वो घटना याद है जब मैं लगभग साढ़े तीन वर्ष का था। इतनी छोटी उम्र में घटित घटना ने मेरे मन—मस्तिष्क पर ऐसा प्रभाव डाला था कि वो हमेशा कल की बात लगती है।
मॉं उस समय बहुत बीमार थी। वह सुध—बुध खोकर बिस्तर पर पड़ी थी। दादी, पापा सब ने बताया कि मॉं बीमार है, भगवान से बोलो वो तुम्हारी मॉं को ठीक कर देंगे। मैं उस समय भगवान शब्द से भी अनजान था। घर में मॉं के बिस्तर के पास ही मालिक बाबा की तस्वीर लगी थी। मै। वहां जाकर खड़ा हो गया और निश्छल भाव से मालिक बाबा को सम्बोधित कर कहने लगा— '' हे मालिक बाबा हमर मॉं के सब दु:ख दूर करियौ ओकरा ठीक क' दियौ।'' और मेरी आंखों से निरंतर आंसू बह रहे थे। तभी मॉं ने आवाज लगायी— ''हां देखै ने हम ठीक छियै, बाबा तोहर बात सुनि लेलखुन— हम ठीक भ' गेलियौ।'' उनकी आंखों से भी अश्रु—धारा प्रवाहित हो रही थी।
 आज भी वो निश्छल प्रेम को याद करता हूं और ज्ञानेन्द्रियों के जाल से मुक्त होकर उसी भाव में बहकर अपने आराध्य सद्गुरू की आराधना करना चाहता हूं। परंतु इनकी शक्ति और माया का कोई पार नहीं है। जब कभी परिवार में कोई परेशानी होती, हम दौड़ कर मालिक बाबा के पास पहुंच जाते। हमें पूर्ण विश्वास था कि वो उसका हल जरूर निकालेंगे और सदैव ऐसा ही होता था।

दादी के अनन्य प्रयास, हमारे प्रति अगाध प्रेम तथा मालिक बाबा में पूर्ण विश्वास के फलस्वरूप वो सुखद घड़ी भी आ गई जब अल्पायु में ही मुझे सभी बांधवों सहित अपने परम आदरणीय मालिक बाबा के और निकट होकर उनके शिष्य बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। अब वे हमारे मालिक बाबा के साथ—साथ परम श्रद्धेय पूज्य सद्गुरूदेव भी थे।
 किसी भी आकुलता के समय उनकी कुटिया पर पहुंचकर शांति मिल जाती थी। मैं थोड़ा संकोची प्रवृति का व्यक्ति हूं। इसलिए कई बार मैं अपनी आकुलता में कुटिया पर चला तो जाता था परंतु वहां सबों के सामने कुछ बोल नहीं पाता था। लेकिन मालिक बाबा के दर्शन मात्र से ही आकुलता शांत हो जाती थी। उनकी शीतल वाणी तो अंतरतम को शीतल कर देती थी। दरभंगा में भी जब कभी बाबा कहीं आते थे तो हम लोग भागकर उनकी बंदगी करने जाते थे और उस दिन को धन्य मानते थे कि आज उनके दर्शन हुए।
 एक और बाल सुलभ घटना स्मरण हो रही है जिसका उल्लेख किये बिना नहीं रहा जाता। बचपन में परीक्षा के समय प्रत्येक बच्चों में परिणाम को लेकर आशंका/भय व्याप्त रहता है। इसलिए कई साथी भगवान के आगे घरों में अथवा मन्दिरों में परीक्षा में लिखने वाले पेन/कलम को रख देते थे और उसी कलम से परीक्षा में लिखते थे, इस से उनमें परिणाम को झेलने की शक्ति मिलती थी। (ऐसा उस समय मेरे जैसे कई छात्रों का विचार था) मेरी भी बोर्ड की परीक्षा थी। मैं भी बेहतर परिणाम की अभिलाषा में मालिक बाबा से आशीर्वाद लेने पहुंचा(हमारे लिए एकमात्र सब कुछ हमारे मालिक बाबा थे/हैं)। मैं साथ में एक नहीं दो—दो नई कलम ले गया था। कुटिया पर पहुंच कर बाबा को बंदगी की। बाबा ने कुशल—क्षेम पूछा और तत्पश्चात भोजन ग्रहण करने को कहा। मैं संकोचवश कुछ बोल नहीं पा रहा था और वहां से भोजन के लिए हट भी नहीं पा रहा था। बाबा ने पूछा क्या बात है और अपनी समस्या बताने के लिए कहा। आखिरकार मैंने अपनी संकोच को दूर कर बोला — '' बाबा अपनेक आशीर्वाद लेब' आयल छी, मैट्रिक के परीक्षा छै।'' और एक पेन निकालकर आगे कर दिया। बाबा पहले हंसे, फिर बोले— ''देखू बौआ बिनु पढने जौं सब आशीषे सं' पास भ' जेतै त अपने सोचियौ कतेक अकर्मण्यता आबि जेतै। अहि लेल पढ़ाई त बहुत जरूरी छै। मन लगा क पढू अवश्य पास होयब।'' मैं थोड़ा निराश होने लगा। फिर बाबा मुस्कुराते हुए मेरे हाथ से कलम ले लिए और मेरे दायें हाथ पर उससे भगवत् नाम लिखने लगे। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। मैंने झट दूसरा पेन भी आगे कर दिया और बोला—''बाबा कहीं बीच में ही पेन खत्म भ' गेलै त, तैं इहो पेन पर कृपा करियौ।'' बाबा हंसते हुए उस पेन से भी  मेरी हथेली पर लिखने लगे। फिर उन्होंने अत्यंत कृपा की जिसे याद कर आज भी शरीर रोमांचित हो उठता है। उन्होंने अपने दोनों हाथ मेरे मस्तिष्क पर रख दिया। आशीर्वाद का ऐसा अनुग्रह पहले कभी नहीं प्राप्त हुआ था, मैं अभिभूत हो उठा।

अवतार जिस गुरूदेव का युगधर्म ले होता सदा।।
उस महामानव के लिए दृढ़ भक्ति होवे सर्वदा।।
हे नाथ जग में प्रकट हों तव संत की शुभ आत्मा।
जो कलह—दु:ख—कुविचार का जग से करें नित् खात्मा।।
संत रूप भगवान,
            प्रकटे जग में सर्वदा।
दे सबको शुभ ज्ञान,
            करैं सुखी संसार को।।
                            (सद्गुरूदेव द्वारा रचित प्रार्थना से)
अनेकों ऐसी छोटी—बड़ी घटनाएं हैं जो हमें निश्चिंत करती थी कि हमारे साथ हमारे मालिक स्वयं मालिक बाबा हैं। हमारी सभी दु:खों/समस्याओं का हल निकालने वाले, हम पर कृपा करने वाले साक्षात प्रभु।
 मालिक बाबा के बारे में शायद बहुत कम लोग जानते होंगे कि आज भरवाड़ा कबीर आश्रम में होने वाले इतने विशाल वार्षिक भण्डारा के शुरूआती वर्षों में बाबा उसके आयोजन के लिए पूरे वर्ष तक प्रतिदिन अपने एक समय के भोजन बचाकर रखते थे ​ताकि भण्डारा में कोई भी संत द्वार से भूखे न लौटें। सभी दीन—दु​:खियों की सेवा में उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। उस समय लोगों के पास इलाज के लिए न धन होता था और न ही कोई सुविधा थी। उन्होंने अपने विलक्षण जड़ी—बूटी के ज्ञान का उपयोग कर लोगों की नि:शुल्क/नि:स्वार्थ सेवा देना प्रारम्भ किया और पूरे लगन से दीन—दु:खियों की सेवा में सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।

मैं जब अपनी नौकरी लगने की सूचना देने उनके पास गया तो वे अत्यंत हर्षित हुए। फिर जम्मू जैसे आतंकवाद से ग्रस्त क्षेत्र में अपनी पोस्टिंग की बात बतलाई तो उन्होंने भगवत सुमिरन की सलाह दी और सब कुछ भगवान पर छोड़ने को कहा। उस समय मुझे यह कतई भान नहीं था कि यह मेरी उनसे अंतिम भेंट होगी। मैं जब जम्मू जाने की तैयारी कर रहा था तो दिल्ली में उनके अत्यंत अस्वस्थ होने की सूचना मिली। मन व्याकुल हो गया और आकुलता में मैंने अपने मालिक बाबा के स्वास्थ्य लाभ हेतु विनती लिखी—

हे दीन दयाल दया कीजै ।
हम दीन अबोध की अरजी लीजै ।।

हे नाथ, सनाथ तुमहि से हम,
नहिं हमे अनाथ प्रभो कीजै ।।

हे जगत—पिता, हे परम—पूज्य,
विनती बस इतनी है तुमसे ।
हम सबके नाथ और पूज्य गुरू,
की स्वास्थ्य कामना है तुमसे ।।

हे नाथ कृपालु कृपा कर दो ।
हम सबकी खाली झोलियां भर दो ।।

हे दीन—दयाल, हे कृपा—निधान,
अरजी मेरी इतनी सुनिये ।
प्रभो नाथ हमारे गुरूवर को,
चिर स्वास्थ्य—लाभ को वर दीजै ।।

हे दीन दयाल दया कीजै ।
हम दीन अबोध की अरजी लीजै ।।

परंतु भगवान को कुछ और ही मंजूर था। वर्ष 2009 के आखिर में वो सबसे दु:खद दिन भी आया। उन दिनों में मैं अपनी सेवा के प्रारम्भिक दौर में जम्मू में था। पापा का फोन आया, वो बोले— ''हम सब अनाथ भ' गेलौं, मालिक बाबा नै रहलाह।'' शरीर सुन्न पड़ गया। मालिक बाबा ​के बिना हमलोग जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। सचमुच हम अनाथ हो गये।
    हे परम पूज्य श्रद्धेय मालिक बाबा हम आज भी आपके बताये राह पर चलने का प्रयास करते हैं। प्रयास इसलिए लिख रहा हूं, क्योंकि कभी—कभी उलझनें, बाधाएं, समस्याएं इतनी कमर तोड़ देती है कि राह से भटकने लगता हूं। अंधविश्वासी भी बन जाता हूं। मालिक बाबा आपके बिन हम सचमुच अनाथ हैं। अपने हिसाब से सबकुछ अच्छा करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। भगवत् भजन के लिए मिलने वाले हर मौके पर सदैव उन परम् पुरूष परमात्मा के निराकार स्वरूप का ध्यान करते हैं, जिसका भेद आपके साकार रूप ने कराया था। फिर भी बाधा—विघ्न रूपी दीवार नहीं टूटती, जिन्दगी उलझती चली जाती है। मन अशांत होकर अंधविश्वासी बना देता है। यहां—वहां सबको प्रणाम करते हुए सबसे पागलों की तरह क्षमा—याचना करता रहता हूं। उन राहों को जिनके बारे में कभी आपने बताया था कि वो सब व्यर्थ हैं, केवल परमात्मा का भजन और कर्म ही सब कुछ है, पर अनायास ही चल पड़ता हूं। हे परम पूज्य मालिक बाबा हमें शक्ति प्रदान कीजिए की हम परमात्मा के मार्ग पर दृढ़ होकर प्रगतिशील रहें।
हे परम पूज्य गुरूदेव जू, हम अनाथ पर दया कीजै।
हम दीन अबोध की अरजी लीजै,
प्रभु मोहि​ अपने शरण लीजै।।

    शुभेश   
सप्रेम साहेब बन्दगी—3

सोमवार, 18 सितंबर 2017

मेरे राम

12:26:00 am
मेरे राम
मेरा राम न जन्‍म है धरता,
हर घट भीतर में वो बसता ।
                                    मैं नहीं पूजूं उनको भाई,
                                    जो रावण से लड़े लड़ाई ।
मेरे राम को प्रेम सभी से,
मिलते सहज भाव सब ही से ।।
                                     मैं ना ढूंढू मन्दिर-मस्जिद,
                                     ना गिरिजा ना कोई शिवालय ।
मन के भीतर ही मैं झांकू,
निर्मल-मन-चित्‍त है देवालय।।
                                      राम नहीं मन्दिर में रहते,
                                      बच्‍चों की मुस्‍कान में बसते ।
बच्‍चों सा निर्मल बन जाओ,
राम को अपने सम्‍मुख पाओ ।।
                                       निराकार स्‍वरूप है उनका,
                                       सत्‍य नाम हैं सब ही उनका ।

                   राम चरण गहि कहें ‘शुभेश’,
                   करहुं दया नहिं व्‍यापे क्‍लेश ।।

(विभागीय पत्रिका में प्रकाशित)