बुधवार, 15 जुलाई 2015

शर्मा जी बने डॉक्टर

11:43:00 am
शर्मा जी बने डॉक्टर
मेरे पड़ोस में शर्मा जी रहते हैं,
हर मुद्दों पर गरमा—गरम बहस करते हैं ।
ज्ञान के मामले में तो शुन्य हैं,
समझते अपने को परिपूर्ण हैं ।।

एक सुबह शर्मा जी को सपना आया,
डॉक्टर बनकर उन्होंने खूब माल कमाया ।
बस फिर क्या था, शर्मा जी चले डॉक्टर बनने,
सफेद कोट सिलवायी, और चले सपने को सच करने ।।

साले ने जुगत भिड़ाई,
एमबीबीएस की फर्जी डिग्री दिलाई ।
अब शर्मा जी बन गए डॉक्टर,
और उनके साले साहब हो गए कम्पाउण्डर ।।

दोनों ने मिलकर क्लिनिक खोली,
चार दिवस इंतजार में ही निकली ।
जब कोई मरीज नहीं आया,
शर्मा जी का दिल घबराया ।।

पांचवें दिन हुए मरीज के दर्शन,
देख जीजा—साले का खिल गया मन ।
ऐसा ईलाज करूं मैं इसका,
बनूं चहेता डॉक्टर सबका ।।

बंदे ने मर्ज बताई,
था वो दस्त से परेशान भाई ।
शर्मा जी ने ऐसा ईलाज किया,
वो बेचारा स्वर्ग सिधार गया ।।

दोनों को हुई घबराहट, बात हुई ये ऐसी,
बात न बाहर फैले ये, कोई जुगत लगाओ वैसी ।
चलो दोनों इसे उठाते हैं,
पीछे के वन में दफनाते हैं ।।

साले था पकड़ा लाश को पीछे,
और अपने आंखों को मींचे ।
जो मल था धोती के अंदर,
सब गिरा साले के ऊपर ।।

खैर! किसी तरह निपटाया,
उसको जाकर ​दफनाया ।
अगले दिन जब क्लिनिक आया,
था एक मरीज पहले से आया ।।

देख दोनों की आंखें चमकी,
चलो आज होगी बोहनी अच्छी ।
मरीज ने मर्ज बताया,
उसे भी था दस्त ने सताया ।।

सुनकर दोनों फिर चौंके,
फौरन अंदर को लपके ।

साला बोला जीजा से ,
अपने सर को जकड़े ।
फैसला हो पहले इसका
कि पीछे कौन पकड़े ।।
                  ~~~शुभेश
(विभागीय पत्रिका में प्रकाशित)

उठ भोर भई

7:27:00 am
उठ भोर भई
उठ भोर भई, उठ भोर भई, अब जाग री मेरी गुड़िया ।
जग गई सारी ​दुनिया ।

मम्मी—पापा जागे, जग गए मामा—मामी,
दादा—दादी जागे और जग गए नाना—नानी ।
अरे खुलि गए सारे किवड़िया, अब जाग री तू भी गुड़िया ।।
उठ भोर भई....................................

चंदा मामा जाए, सूरज दादू आए,
अंधियारा भी जाए, हर कली मुसकाए ।
अरे जग गई सारी दुनिया, अब जाग री तू भी गुड़िया ।।
उठ भोर भई....................................
उठ भोर भई, उठ भोर भई अब जाग री मेरी गुड़िया ।
चली खेलन सारी दुनिया ।।
                                                              ~~~शुभेश

मंगलवार, 14 जुलाई 2015

कभी सुबह तो होगी

11:04:00 pm
कभी सुबह तो होगी
सूरज की लालिमा बिखर चुकी है,
रात का अंधियारा छंट चुका है ।
उगते हुए उस बड़े से सूरज को देख
वो मासूम बचपन याद आ रहा है,
जो कहीं खो गया है, गुम हो गया है ।।

आप कहते हैं मैं अभी सात का हूं,
तो कहां छुपा है, यहीं है, यही तो है तेरा बचपन ।
हां यहीं है मेरा बचपन, खयालों में ही सही,
यहीं है, यहीं है मेरा बचपन ।।

खयालों में ही सही, हमउम्रों को देख मैं भी
धूलों में लोटता हूं, गांव की गलियों में दौड़ता हूं ।
कंचे खेलता हूं, धूम मचाता हूं, खयालों में ही सही ।
मालिक के डांटने पर, पीटने पर मां बालों में
प्यार से हाथ फेरती तो है, खयालों में ही सही ।
हां बचपन तो है, खयालों में ही सही ।।

कल एक प्लेट ही तो टूटी थी,
या फिर मेरी किस्मत ही फूटी थी ।
उसने गालियों की जो गुबार निकाली थी,
सुनकर शायद शरम भी शरमाई थी ।
पर मैं, मैं नहीं शरमाया
मैं तो वहीं बुत बना खड़ा था ।
शायद खुद को ढूंढ रहा था ।।

अब तो मेरे आंसू भी सूख गये हैं,
ये तो रोज की बात है, कह वो भी रूठ गये हैं ।
कभी गाली, कभी मारपीट, यही अब मेरी कहानी है,
भर—पेट खाने की लालसा में, बीती जा रही जिन्दगानी है ।।

ऊषा की लालिमा तो रोज आती है,
सारे जग के अंधकार मिटाती है ।
मेरा अंतर्मन मुझे देता है रोज दिलासा,
कि कभी तो कोई आएगा ।
जो मसीहा बनकर मेरे,
सिसकते हुए बचपन को फिर से हंसाएगा ।।

सपनों की वो जमीं कभी सच तो होगी ।
हां 'शुभेश' आज न सही मेरे लिए भी, कभी सुबह तो होगी ।।
                                                       ~~~शुभेश
***Please Strictly Avoid Child Labour***

गुरूवर नमन तुम्हें शत बार है

10:29:00 pm
गुरूवर नमन तुम्हें शत बार है
नमन तुम्हें शत बार है गुरूवर, नमन तुम्हें शत बार है ।
पाप—पुण्य का भेद कराया,
दया धरम का मार्ग दिखाया ।
स्नेह भरा जो हाथ फिराया, कोटि—कोटि आभार है ।।
नमन तुम्हें शत बार है.............................................
सत की नाव में मुझे बिठाया,
नाम रूपी पतवार थमाया ।
निराकार का भेद बताया, वो रूप तेरा सा​कार है ।।
नमन तुम्हें शत बार है.......................................
क्रोध—लोभ को पास न लाना,
माया मोह से बच के रहना ।
माया ठगिनी बड़ी सयानी, तूने किया खबरदार है ।।
नमन तुम्हें शत बार है..........................................
हम अज्ञानी इंद्रिय वश में,
बंधते जाते भव बंधन में ।
तूने ज्ञान की ज्योति जलाकर,
तन और मन दोनों धुलवाकर ।
आतम—राम का मिलन कराकर, किया बड़ा उपकार है ।।
नमन तुम्हें शत बार है...................................................
                                                                   ~~~शुभेश

पहली नजर

10:11:00 pm
पहली नजर
पहली बार नजर भर देखा,
मन अंदर से मचल हो बैठा ।
लंबे बाल हैं काले—काले,
लट बिखराये भाल सजाये ।।

दो नयना अति शीतल तारे,
दूर करे सारे अंधियारे ।
सजी संवरी वो सामने बैठी,
मेरे अंदर तक वो पैठी ।।

उस पल को अब कोस रहा हूं,
मन को अपने मसोस रहा हूं ।
पहले क्यों नहिं मैंने हां की,
मति मेरी भी गई कहां थी ।।

अब तो पल—पल दिवस है लगता,
याद में उनकी दिन है कटता ।
उनकी बोली मधुर है ऐसी,
शहद मिलायी गई हो वैसी ।।

निशि दिन मधुरपान मैं करता,
याद में उनके सपने बुनता ।
अच्छा लगे न कुछ भी यारा,
कब होगा दीदार तुम्हारा ।।

प्रतिपल सोचे यही 'शुभेश'
इंतजार होंगे कब ये शेष ।।
                       ~~~शुभेश

जाने वो सुबह कब आएगी

9:57:00 pm
जाने वो सुबह कब आएगी
जाने वो सुबह कब आएगी, जाने वो सुबह कब आएगी ।
इन सूनी—सूनी अंखियों को जाने कब तक तरपाएगी ।
कब बरसेंगी अधरों पे अधर, कब मिलन की प्यास बुझाएगी ।।
मेरे तन से जो उठती अगन, कुछ और नहीं तेरी माया ।
तेरे तन की वो मीठी छुअन, कब मिलेगी वो शीतल छाया ।।
वो हंसी ठिठोली मुसकाना ।
पलक उठाकर देखना यूं, फिर पलक झुकाकर शरमाना ।।
वो प्यार भरी तेरी बातें, छोटी करती लम्बी रातें ।
बरबस गालों को यूं चूमना ।
कभी चेहरे को यूं उठा—उठाकर, उंगली को अपने घुमा—घुमाकर ।
बातों से सपने बुनना ।।
मुझे याद बहुत ही आती है, तेरी याद सदा तरपाती है ।
देखेंगे जाने कब ये नयन, जो मन में बसी चंचल काया ।
तरपा तो पहले भी था बहुत, इतना न किसी ने तरपाया ।।
                                                                     ~~~शुभेश



यूं ही सफर में

9:54:00 pm
यूं ही सफर में
वो सहमी, वो चुपचुप, अपने में गुमसुम ।
न बोले न हंसती, डब्बे में कोई नहीं भी है वैसी ।
मेरा ध्यान खींचे, क्यूं है वो ऐसी ।।
उसके साथ कुनबा है सारा का सारा।
पर लगता नहीं कोई उसको है प्यारा ।।
गोद में उसकी है, नन्हीं सी गुड़िया ।
कोमल—सुकोमल, चंचल इक बिटिया ।।
कभी मुंह चूमें, कभी बाल खींचे वो नन्हीं सी गुड़िया ।
उस नन्हीं सुकोमल की चंचल छुअन की,
सहज एक चाहत उठती है मन में ।
पर जैसे उस मां को उस नन्हीं सी जां की,
न थोड़ी सी चिंता, न चाहत है मन में ।।
हुई रात अब तो सोने की चिंता,
छ: सीट है और सात सवारी ।
लो सीटों पे सोएंगे सारे के सारे,
बस नीचे सोएगी, अम्मा संग प्यारी ।।
कहते वो आए मां वैष्णों यहां से ।
जो जगत जननी सबकी वो जगदम्बे मां से ।।
पूछे है ये मन, क्यूं इतनी उपेक्षा,
उस नन्हीं सी जां की, जां की और मां की ।।
                                               ~~~शुभेश

सोमवार, 13 जुलाई 2015

मैं भारतवासी हूं

3:28:00 pm
मैं भारतवासी हूं..........
मैं भारतवासी हूं, फक्र करूं या शर्म करूं ।
ये तो वो भारत—भुमि नहीं, जहां राम,कृष्ण ने राज्य किया ।
पापियों का संहार किया और जनजीवन को आबाद किया ।।
चन्द्रगुप्त और महाराणा प्रताप की कथा लगे सपनों जैसी ।
सब लगे हैं स्वार्थ—सिद्धि में, परोपकार और ईमानदारी कैसी ।।
सांसदों की बात न पूछें, बस इनकी करतूतें देंखे ।
हर मामले पर डाल अड़ंगा, शुरू कर दें मार—पीट और दंगा ।।
सांसदों की करनी सुनकर, हर कोई ये शरम से कहता ।
क्या ये संसद है, यहीं कानून है बनता ...........?
आज यहां नंदीग्राम की घटनाओं का बोलबाला है ।
औद्योगिकरण और विकास के नाम पर होता बड़ा घोटाला है ।।
सरकार भ्रष्ट, व्यभिचार पुष्ट,
जनता है त्रस्त, कहे किससे कष्ट ।।
पाठकों आप करें स्पष्ट,
मैं फिर से वही प्रश्न करूं,...................
मैं भारतवासी हूं, फक्र करूं या शर्म करूं ।
                                        ~~~ शुभेश
(वर्ष 2007 में तत्कालीन परिस्थितियों के आधार पर ​रचित)
(विभागीय पत्रिका में प्रकाशित)

हे अपरंपार पार करो नैया

3:13:00 pm
पार करो नैया
हे अपरंपार पार करो नैया फंसी है बीच भंवर में ।
तुम बिन दूसर कोई न खेवैया, इस अथाह सागर में ।।
हम हैं पापी अवगुण राशि, करम अधम अति मेरे ।
सुख—दु:ख, धन—संपति और विपदा, हैं सब माया तेरे ।।
लोभ—क्रोध, मद—मोह जनित यह पाप की गठरी भारी ।
कैसे पार करूं मैं भव को, हूं अब शरण तुम्हारी ।।
हम नादान चंचल अज्ञानी, विनती करूं मैं कैसे ।
जैसे तारा गज और गणिका, तारो हमको वैसे ।।
                                                          ~~~शुभेश
('सत्य की ओर' पत्रिका में प्रकाशित)

माँ

2:53:00 pm
माता
सृष्टि की सबसे सुंदर रचना है माँ ।
मेरी माँ, प्यारी माँ, न्यारी माँ ।।
बाल रूपी अंकुर को अपने स्नेह की
छाया में जीवन देने वाली माँ ।
बच्चों के बचपन संवारने में अपनी रातों की नींद,
व दिन का चैन गंवाने वाली माँ ।।
प्रेम और स्नेह की बगिया मेें,
सद्गुणों का पाठ पढ़ाने वाली माँ ।
दीये की तरह खुद जलकर,
बच्चों का भविष्य रोशन करती माँ ।।
पर ये बच्चे क्या कर रहे हैं ।
आईये देखें वो क्या कह रहे हैं ।।
माँ मैं अब बड़ा हो गया हूं ।
अपने पांवो पर खड़ा हो गया हूं ।।
माँ के स्नहे को अब वे बीवी के प्यार से तौलते हैं ।
दो जरूरी बातें भी माँ बहू से कहे तो उनके खून खौलते हैं ।।
अब उन्हें माँ का स्नेह जायका फीका लगता है ।
माँ की मधुर आवाज भी शोर तीखा लगता है ।।
माँ तू क्या दिन भर बक—बक करती है ।
मेरी बीवी खुले विचारों वाली है,
उसे क्यों हर बात पर टोका करती है ।।
माँ कहती है — हां बेटा मैं तो पुराने खयालों वाली
ये तो नया जमाना है ।
माँ समझा करो तू आज है कल नहीं,
पर बीवी के साथ तो आगे तक जाना है ।।
बेटों की करतूतें देख बहुत शरम—सी आती है ।
जिस माँ ने अकेले चार—चार बेटों को पाला,
उन चारों से एक अकेली माँ पाली नहीं जाती है ।।
                                                        ~~~ शुभेश
(विभागीय पत्रिका में प्रकाशित)

पिता

2:27:00 pm
पिता
बचपन से मैने देखा उन्हें,
दु:ख झेलते हुए हमारे लिए ।
जीना क्या है भूल गए वो,
जीया है उन्होंने हमारे लिए ।।

खुद के तन की न कोई फिकर,
न दु:खी देख सकते हमें पल भर ।
हमारी दु:खों पर वो रोए बहुत,
है देखा उन्हें हर पीड़ा हमारी समेटे हुए ।।

हमें चाहिए थी नई शर्ट, नए पैंट,
जूते वो भी तसमें लगे हुए ।
दिया उन्होंने वो सब कुछ हमें,
पर देखा उन्हें एक चप्पल को वर्षों घिसते हुए ।।

बड़ी मेहनत से उन्होंने पढ़ाया हमें,
कुछ करूं इस लायक बनाया हमें ।
देखा है मैनें मेरी हर—इक खुशी में,
मुझ से भी अधिक खुश होते हुए ।।

जीवन का हर पल ऋणी है तेरा,
बिन तेरे कुछ नहीं कुछ नहीं है मेरा ।
इस जमीं पर कहीं पर अगर जो खुदा है
वो पिता है, पिता है, पिता है, पिता है ।।
                                          ~~~शुभेश
(विभागीय पत्रिका में प्रकाशित)

हे प्रभु कैसी ये लीला

1:55:00 pm
हे प्रभु कैसी ये लीला
हे प्रभु ये कैसी है लीला, कृपा कर मुझे बताएं ।
करम—धरम सब हाथ में तेरे, फिर क्यों हम घबराएं ।।
जीव खिलौना तेरे हाथ का, जैसे चाहो नचाते ।
तुम ही कर्ता, तुम ही विधाता, जहां मर्जी ले जाते ।।
प्रभु ईच्छा से ही हम हंसते, प्रभु ईच्छा से रोते ।
प्रभु ईच्छा बिन तृण नहिं डोले, फिर पापकर्म क्यों होते ।।
विद्वजनों की बात सुनूं तो होता अचरज भारी ।
सत्कर्म करूं तो प्रभु प्रेरित हैं, दुष्कर्म में गलती हमारी ।।
जब सबकुछ तेरी ही ईच्छा, फिर पक्षपात ये कैसा ।
किसी को राम बना देते तुम, किसी को रावण जैसा ।।
कोई गाँधी बन जाता तो, कोई निर्दयी गोरा ।
कैसा खेल तुम्हारा है प्रभु, समझ न आए थोड़ा ।।
क्यों ये नहीं हो सकता प्रभु की, कहीं पाप नहिं होते ।
कोई न रहता रावण जग में, सभी राम हीं होते ।।
                                                          ~~~ शुभेश

(विभागीय पत्रिका में प्रकाशित)

प्रभु मोहि अटल भक्ति दीजै

2:49:00 am
प्रभु मोहि अटल भक्ति दीजै
                प्रभु दीन दयाल दया कीजै ।
                मेरे सब अपराध क्षमा कीजै ।।
इस जग माया में जब मैं आया,
आतम ज्ञान सकल बिसराया ।
                ठगिनी माया चाप चढ़ाई,
                लोभ मोह की बाण चलाई ।
जीव में प्रकट कीन्ह अभिमाना,
फंसि गए लाखों संत सुजाना ।
                हे प्रभु मैं तो जड़मति बालक,
                तुम ही रक्षक तुम प्रतिपालक ।
माया मोह दिन—रात सतावै,
लोभ—क्रोध की अग्नि जलावै ।
                तव चिन्तन में मन नहिं लागै,
                मन नहिं थिरै न चित ठहरावै ।
हे प्रभु कोई जतन कीजै,
अब मोहि अपने शरण लीजै ।
                नित नाम सुमिरूं शक्ति दीजै ।
                प्रभु मोहि अटल भक्ति दीजै ।।
प्रभु दीन दयाल ...........................
मेरे सब अपराध ...........................
                                              ~~~शुभेश