गुरुवार, 5 सितंबर 2019

शिक्षक दिवस पर सभी गुरूजनों को कोटि—कोटि वंदन

8:08:00 am
teachers-day

आज शिक्षक दिवस है अर्थात अपने गुरूजनों को स्मरण करने का पावन दिवस। यूं तो कभी भी उन्हें विस्मृत करने का प्रश्न ही नहीं उठता, अपितु एक दिन ऐसा हमें मिला है जिस दिन हमें उन्हें स्मरण कर उनके सुकृत्यों, दीक्षाओं से सीख ले सकते हैं, जीवन के बाधाओं से लड़ने हेतु पुन: प्रयासरत हो सकते हैं।

मेरा यह सौभाग्य है कि मुझे भी अपने जीवन में कदम—कदम पर ऐसे गुरूजनों का अनुग्रह प्राप्त हुआ जिन्होंने मुझे एक नई दिशा दी। सर्वप्रथम गुरू स्वाभाविक रूप से प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में उनके माता—पिता होते हैं। मेरे जीवन में भी मेरी मॉं और पापा ने प्रथम गुरू की उल्लेखनीय भूमिका निभाई। आज मेरे विचारों में थोड़े—बहुत जो भी सत् गुण रूपी भाव विराजमान हैं, वह उनके ही सीखों का परिणाम है। गणित के कठिन—से—कठिन सूत्र हों अथवा संस्कृत के धातु रूपों को उनको सरलतम रूप में समझा कर कंठाग्र कराना सब पापा के शिक्षाओं का ही परिणाम है। बचपन में एक बार मुझे घर से पैसे निकालकर चॉकलेट—बिस्किट खाने की आदत लग गयी थी। पापा जानकर अत्यंत व्यथित हुए, परंतु उनके समझाने के तरीके ने न मेरी आदत छुड़ाई बल्कि मनोवैज्ञानिक रूप से गहरा प्रभाव भी डाला। हाथ उठाने के स्थान पर उनका आंखें दिखाना अथवा आंखें फेर लेना ही काफी होता है। कहा भी गया है: मातु—पिता ही प्रथम गुरू होते हैं। उन्हें सप्रेम साहेब—बन्दगी।

इसके बाद प्राथमिक विद्यालय के जगन्नाथ सर, रामरेखा सर, पाण्डेय सर हों या कुमुद चाची। उन्होंने जीवन पथ पर आगे बढने में जो ज्ञान रूपी बीज बोये उनके लिए हृदय की गहराईयों से आभार और वंदन। फिर माध्यमिक विद्यालय के गयासुद्दीन सर, रवीन्द्र सर, देवेन्द्र सर, नारायण सर, कुंवर सर और हरिवंश सर ने इन बीजों को अंकुरित करने के लिए ज्ञान रूपी जल से मुझे भली—भांति सींचा, उनको सादर वंदन। उच्च माध्यमिक विद्यालय में शारदानन्द सर, अनिरूद्ध सर,  निराला सर, बलदेव सर आदि अनेकों शिक्षकों ने मुझ जैसे अनेकों शिक्षार्थियों के ज्ञान के पौधे को साकार रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उनकों आत्मिक आभार।
आदरणीय दिलीप सर और दिनेश सर ने मेरे शैक्षणिक जीवन को प्रगति पथ पर गतिशील करने में  बहुत सहायता की उनको सादर प्रणाम। 

आज भी मुझे याद है, जब मेरी बोर्ड परीक्षा का परिणाम पेण्डिंग लिस्ट में आया था, मेरा रो—रोकर बुरा हाल था। उस समय आदरणीय दिनेश सर ने आगे बढने की प्रेरणा देते हुए मुझे हिम्मत दिया था जिसे मैं कभी भी नहीं विस्मृत कर सकता। सदैव की तरह संकोची प्रवृति का होने के कारण मैं कभी भी अपनी भावनाओं को उनके सम्मुख अभिव्यक्त न कर पाया।  कभी भी अनजाने में मुझसे हुई भूल के लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूं। उन्हें हार्दिक वंदन।

मुझे प्रतियोगी जीवन में सफल बनाने हेतु ज्ञान के नव अंकुर डालने वाले आदरणीय संतोष सर का उल्लेख किये बिना मेरा निवेदन अधूरा ही रहेगा। उन्होंने अपने सरल—स्वाभाविक तरीकों से समझाकर मुझे प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता प्राप्त करने में सहायता प्रदान की। उन्हें हार्दिक वंदन।

मेरे छोटे—बड़े भाई, मित्र, जीवन संगिनी और मेरी बेटी से भी मुझे बहुत—कुछ सीखने को मिला। इसलिए ये भी आदरणीय हैं और इस अवसर पर मैं इन्हें भी नमन करता हूं। कार्यालयीन जीवन में आदरणीय मिथिलेश सर, बलविन्‍दर सर, देवेन्‍द्र सर, देवराज सर, वीणा मैडम, आदि अनेकों श्रेष्‍ठजनों ने गुरू की भूमिका निभाई। आज के दिन मैं उन्‍हें भी नमन करता हूं।

मेरे धार्मिक जीवन को दृढ कर नई दिशा देने हेतु मुझ पर अत्यंत कृपालु करने वाले प्रात: स्मरणीय परम पूज्य गुरूदेव मालिक बाबा ने मुझे दीक्षा देकर मेरे अनेकों जन्मों के सुकृत्यों का सुफल दिया और जीवनमार्ग में आने वाली बाधाओं के निदान हेतु मार्ग खोल दिये। उनको कोटि—कोटि वंदन। सप्रेम साहेब—बन्दगी। मैं सदैव उनका ऋणी रहूंगा।

आप सभी गुरूजनों को कोटि—कोटि वंदन।

गुरू: ब्रह्मा गुरू: विष्णु, गुरू: देवो महेश्वर: ।
गुरू: साक्षात् परम् ब्रह्म:, तस्मै श्री गुरूवे नम: ।।
.............................................................शुभेश