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शुक्रवार, 4 नवंबर 2022

चहुँ दिशि घिरल अन्हरिया

2:26:00 pm

चहुँ दिशि घिरल अन्हरिया


चहुँ दिशि घिरल अन्हरिया ओ बाबा

चहुँ दिशि घिरल अन्हरिया

कतौ ने देखी इजोरिया ओ बाबा

कतओ ने देखी इजोरिया


इंद्री कुटिल भाव मुस्काबय

माया ठगिनी बाण चलाबय

निशि दिन जग भरमाबय ओ बाबा


काम क्रोध के अगिन जराबै

लोभ मोह दिन रात सताबै

डरबै दुःखक बदरिया ओ बाबा


पंथ बतएलौं गुरू कृपा के

साधु संत चलथिन्ह जाहि बाटे

चललौं ताहि डगरिया ओ बाबा


काग जहाजक गति प्रभु मोरा

जाऊं कत, करू ककर निहोरा

शुभेश आब अहींक शरणियाँ ओ बाबा

हम सब अहींक शरणियाँ

🙏🙏🙏

गुरुवार, 5 सितंबर 2019

शिक्षक दिवस पर सभी गुरूजनों को कोटि—कोटि वंदन

8:08:00 am
teachers-day

आज शिक्षक दिवस है अर्थात अपने गुरूजनों को स्मरण करने का पावन दिवस। यूं तो कभी भी उन्हें विस्मृत करने का प्रश्न ही नहीं उठता, अपितु एक दिन ऐसा हमें मिला है जिस दिन हमें उन्हें स्मरण कर उनके सुकृत्यों, दीक्षाओं से सीख ले सकते हैं, जीवन के बाधाओं से लड़ने हेतु पुन: प्रयासरत हो सकते हैं।

मेरा यह सौभाग्य है कि मुझे भी अपने जीवन में कदम—कदम पर ऐसे गुरूजनों का अनुग्रह प्राप्त हुआ जिन्होंने मुझे एक नई दिशा दी। सर्वप्रथम गुरू स्वाभाविक रूप से प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में उनके माता—पिता होते हैं। मेरे जीवन में भी मेरी मॉं और पापा ने प्रथम गुरू की उल्लेखनीय भूमिका निभाई। आज मेरे विचारों में थोड़े—बहुत जो भी सत् गुण रूपी भाव विराजमान हैं, वह उनके ही सीखों का परिणाम है। गणित के कठिन—से—कठिन सूत्र हों अथवा संस्कृत के धातु रूपों को उनको सरलतम रूप में समझा कर कंठाग्र कराना सब पापा के शिक्षाओं का ही परिणाम है। बचपन में एक बार मुझे घर से पैसे निकालकर चॉकलेट—बिस्किट खाने की आदत लग गयी थी। पापा जानकर अत्यंत व्यथित हुए, परंतु उनके समझाने के तरीके ने न मेरी आदत छुड़ाई बल्कि मनोवैज्ञानिक रूप से गहरा प्रभाव भी डाला। हाथ उठाने के स्थान पर उनका आंखें दिखाना अथवा आंखें फेर लेना ही काफी होता है। कहा भी गया है: मातु—पिता ही प्रथम गुरू होते हैं। उन्हें सप्रेम साहेब—बन्दगी।

इसके बाद प्राथमिक विद्यालय के जगन्नाथ सर, रामरेखा सर, पाण्डेय सर हों या कुमुद चाची। उन्होंने जीवन पथ पर आगे बढने में जो ज्ञान रूपी बीज बोये उनके लिए हृदय की गहराईयों से आभार और वंदन। फिर माध्यमिक विद्यालय के गयासुद्दीन सर, रवीन्द्र सर, देवेन्द्र सर, नारायण सर, कुंवर सर और हरिवंश सर ने इन बीजों को अंकुरित करने के लिए ज्ञान रूपी जल से मुझे भली—भांति सींचा, उनको सादर वंदन। उच्च माध्यमिक विद्यालय में शारदानन्द सर, अनिरूद्ध सर,  निराला सर, बलदेव सर आदि अनेकों शिक्षकों ने मुझ जैसे अनेकों शिक्षार्थियों के ज्ञान के पौधे को साकार रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उनकों आत्मिक आभार।
आदरणीय दिलीप सर और दिनेश सर ने मेरे शैक्षणिक जीवन को प्रगति पथ पर गतिशील करने में  बहुत सहायता की उनको सादर प्रणाम। 

आज भी मुझे याद है, जब मेरी बोर्ड परीक्षा का परिणाम पेण्डिंग लिस्ट में आया था, मेरा रो—रोकर बुरा हाल था। उस समय आदरणीय दिनेश सर ने आगे बढने की प्रेरणा देते हुए मुझे हिम्मत दिया था जिसे मैं कभी भी नहीं विस्मृत कर सकता। सदैव की तरह संकोची प्रवृति का होने के कारण मैं कभी भी अपनी भावनाओं को उनके सम्मुख अभिव्यक्त न कर पाया।  कभी भी अनजाने में मुझसे हुई भूल के लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूं। उन्हें हार्दिक वंदन।

मुझे प्रतियोगी जीवन में सफल बनाने हेतु ज्ञान के नव अंकुर डालने वाले आदरणीय संतोष सर का उल्लेख किये बिना मेरा निवेदन अधूरा ही रहेगा। उन्होंने अपने सरल—स्वाभाविक तरीकों से समझाकर मुझे प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता प्राप्त करने में सहायता प्रदान की। उन्हें हार्दिक वंदन।

मेरे छोटे—बड़े भाई, मित्र, जीवन संगिनी और मेरी बेटी से भी मुझे बहुत—कुछ सीखने को मिला। इसलिए ये भी आदरणीय हैं और इस अवसर पर मैं इन्हें भी नमन करता हूं। कार्यालयीन जीवन में आदरणीय मिथिलेश सर, बलविन्‍दर सर, देवेन्‍द्र सर, देवराज सर, वीणा मैडम, आदि अनेकों श्रेष्‍ठजनों ने गुरू की भूमिका निभाई। आज के दिन मैं उन्‍हें भी नमन करता हूं।

मेरे धार्मिक जीवन को दृढ कर नई दिशा देने हेतु मुझ पर अत्यंत कृपालु करने वाले प्रात: स्मरणीय परम पूज्य गुरूदेव मालिक बाबा ने मुझे दीक्षा देकर मेरे अनेकों जन्मों के सुकृत्यों का सुफल दिया और जीवनमार्ग में आने वाली बाधाओं के निदान हेतु मार्ग खोल दिये। उनको कोटि—कोटि वंदन। सप्रेम साहेब—बन्दगी। मैं सदैव उनका ऋणी रहूंगा।

आप सभी गुरूजनों को कोटि—कोटि वंदन।

गुरू: ब्रह्मा गुरू: विष्णु, गुरू: देवो महेश्वर: ।
गुरू: साक्षात् परम् ब्रह्म:, तस्मै श्री गुरूवे नम: ।।
.............................................................शुभेश

रविवार, 5 मई 2019

परम पूज्‍य सद्गुरूदेव श्रीयुत् बौआ साहब जू का पावन अवतरण दिवस

8:54:00 am
परम पूज्य सद्गुरूदेव श्रीयुत् बौआ साहब जू के पावन अवतरण दिवस पर सबों को सप्रेम साहेब बन्‍दगी
Baua-sahab-बौआ-साहब

प्रात: स्मरणीय परम पूज्य सद्गुरूदेव श्रीयुत् बौआ साहब जू के पावन अवतरण दिवस पर उनके श्री चरणों में साहेब बन्दगी —3.

 आज ही के दिन वर्ष 1926 में सद्गुरूदेव जू ने मिथिला क्षेत्र में दरभंगा शहर से लगभग 28 किलोमीटर दूर भरवाड़ा ग्राम में परम पूज्य श्री गिरिवर लाल जू जो मिर्चाई लाल के नाम से विख्यात थे, के घर जन्म लिया था।
मिथिला क्षेत्र में संत कबीर साहेब के सदुपदेशों को जन—जन तक पहुंचाने का पावन कार्य उन्होंने हीं प्रारम्भ किया था। श्रीयुत् बौआ साहब जू ने उनके इस पावन कार्य को सम्पूर्ण भारतवर्ष में प्रसारित करने और दीन—दु:खियों की सेवा करने में अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।

उनका आकर्षक व्यक्तित्व व अंतरतम को शीतल कर देने वाली तेजस्वी वाणी सभी का मन मोह लेती थी। अनायास ही सभी उनकी ओर खिंचे चले आते थे। अनुज श्री शिवेश की रचना उनके व्यक्तित्व का सजीव चित्रण आंखों के सामने प्रस्तुत करती है —

अजब निराले सतगुरू मेरे, चलो दर्शन कर आते हैं ।
ज्ञान—प्रेम की अविरल धारा, चलकर खूब नहाते हैं ।।
अजब निराले सतगुरू .................

भव्य ललाट और बाल सुनहरे, देख मुग्ध हो जाते हैं ।
सतगुरू की मूरत को लखकर, मिलकर शीश झुकाते हैं ।।
अजब निराले सतगुरू ................

हम सब मिलकर ऐसे गुरू की, नित दिन वन्दन करते हैं ।
वचनामृत सुनकर हम उनके, धन्य स्वयं को करते हैं ।।
अजब निराले सतगुरू ................
(शिवेश)

सचमुच हम उनके वचनामृत सुनकर स्वयं को धन्य मानते थे। आज भी उनके शब्दों की प्रतिध्वनि कानों में गूंजती रहती है। अनकों जन्मों के सुकृत्य का ही फल होगा कि इस जन्म में उनसे साक्षात्कार हुआ। परम प्रभु की कृपा का क्या बखान करूं उन्होंने न केवल उनके विशाल परिवार का अंग बनाया, साथ ही उनके शिष्य बनने का सौभाग्य भी प्रदान किया।

बचपन में स्कूल से वापसी में कई बार सीधे उनकी कुटिया पर चला आता था। उस समय हमारे बाल सुलभ प्रश्नोें के उत्तर देते हुए भी वो कई गूढ बातों को बड़ी सहजता से समझा देते थे। कुटिया में सद्गुरू कबीर साहेब की एक बड़ी तस्वीर रखी थी। सायंकाल में प्रार्थना के समय उस कमरे में बस एक दीप जलता रहता था। कोई फूल माला, प्रसाद, आरती कुछ भी नहीं। सब कोई प्रार्थना करते और अंत में एक—दूसरे को साहेब बन्दगी करते। कबीर साहेब की तस्वीर की पूजा न कर हमलोग बस प्रार्थना करते तब यह बात मेरे सामान्य दिमाग में नहीं बैठती थी। सामान्यतया मंदिरों में तस्वीर की ही पूजा होती थी। आस—पास हर जगह यही देखता परंतु कुटिया में ऐसा नहीं था। ऐसे ही एक दिन स्कूल से जब वापसी में कुटिया पहुंचा तो अपनी जिज्ञासा जाहिर कर दी कि इस तस्वीर में भगवान नहीं हैं क्या। बाबा ने समझाते हुए कहा तस्वीर में हीं क्यों हर जगह भगवान हैं। आपमें हममें निर्जीव सजीव सबमें भगवान हैं। फिर तस्वीर की पूजा क्यों नहीं करते, जैसे और मंदिरों में होता है। बाबा मुस्कुराते हुए उत्तर देते हैं कि जब हर जगह भगवान हैं तो केवल इस तस्वीर की ही पूजा क्यों। संसार का ऐसा कोई कण और क्षण नहीं जो भगवान से अलग हो। सर्वत्र भगवान विराजते हैं। आवश्यकता है तो उनको याद करने की पुकारने की। पूजा—पाठ और आडम्बर तो स्वयं को दिखाने के लिए है। उससे आप खुद को समझा सकते हैं कि आप भगवान को याद करते हैं। भगवान को समझाने के लिए तो हृदय की गहराईयों से पुकार निकलनी चाहिए। जब आप सच्चे मन से ध्यान करेंगे तब जहां हैं वहीं भगवान सम्मुख होंगे। इसलिए नियमित रूप से मन लगाकर प्रार्थना तो करनी ही चाहिए, बाह्य आडम्बरों की कोई आवश्यकता नहीं।

मैंने अभी अभी विज्ञान में पढा था कि जगदीश चन्द्र बसु जी ने खोज निकाला था कि पेड़—पौधों में भी जान होता है। तबसे हमारे साथियों ने जो कि सामिष भोजी थे, हमें चिढाना शुरू कर दिया था कि तुम तो नाम के शाकाहारी हो शाक—सब्जी में भी जान होता है अब क्या खाओगे। मैं परेशान, पापा से पूछा। पापा ने समझाया कि शाकाहारी मतलब शाक का आहार करने वाला अर्थात जो शाक सब्जी खाता हो। इसलिए हम सब शाकाहारी हैं। परंतु मैं पूरी तरह संतुष्ट नहीं हुआ तो पापा बोले मालिक बाबा से ही पूछना वो ही समझाएंगे। फिर मैं दादी के साथ कुटिया पर पहुंचा। बाबा को बंदगी बजाने के बाद अपनी समस्या बतायी कि सब दोस्त हमको परेशान करता है। किताब में भी लिखा है और सर भी पढाये हैं, मैं उन्हें क्या जवाब दूं।

बाबा पहले मुस्कुराये फिर बोले कि बोलने वाले ऐसे ही बोलते हैं आप उनकी बातों पर मत जाओ। जो मांसाहार का त्याग नहीं कर सकते वो अनेक कुतर्क करेंगे, वे आप जैसा नहीं बन सकते इसलिए आपको चिढाते हैं, आप ध्यान मत दो। 
मैं बोला— नहीं बाबा मुझे तो जवाब देना है। आप बताइये कि जब पेड़ पौधों में भी जान है तो हमलोग क्या खाएंगे।
बाबा बोले आप नहीं मानेंगे, तो सुनिये— भगवान ने सभी जीवों के लिए आहार निश्चित किया है और उसी के अनुरूप उसके शरीर का निर्माण किया है। हम सभी मनुष्य स्वभाव और शरीर से शाकाहारी हैं। मांसाहारी जंतुओं में एक विशेष दांत रदनक जो चीड़ने—फाड़ने का काम करता है वो पाया जाता है। मनुष्यों में यह नहीं होता। अर्थात हम सब शाकाहारी हैं। मनुष्य केवल अपनी जिह्वा के कारण मांसाहारी है और जीव हत्या का महापाप करता है। जहां तक शाक सब्जी में जान होने की बात है तो शाक सब्जी में जीवात्मा का स्वरूप सुसुप्तावस्था में रहता है। इसका स्वरूप ही ऐसा बनाया गया है।
कबीर साहेब कहते हैं कि दया राखि धरम को पाले, जग से रहे उदासी। अपना सा जी सबका जाने ताहि मिले अविनाशी।। अर्थात जो अपने समान ही सबको समझता है उसे ही ईश्वर मिलते हैं। अब आप स्वयं सोचिए कि जिनके दिल में दया होगी वह किसी की हत्या करेगा। जो अपने पुत्र के समान और जीव जंतुओं के पुत्रों को समझेगा तो जीवहत्या ही नहीं करेगा।

मैं परम पुरूष परमात्मा का हृदय की गहराईयों से आभार प्रकट करता हूं कि उन्होंने हमें परम पूज्य सद्गुरूदेव जू से मिलवाया। उनकी कृपा दृष्टि का क्या कहना। एक छोटा सा सजीव चित्रण प्रस्तुत करता हूं— पापा एक बार अत्यधिक अस्वस्थ हो गए। आंत में सूजन होने की शिकायत के कारण उन्हें दरभंगा में नर्सिंग होम में भर्ती होना पड़ा। बाबा उस समय सुबह—सुबह नर्सिंग होम में पापा से मिलने आए। उस समय पापा बेड पर ही दीवार के सहारे बैठे थे। उन्हें उठने—बैठने में दिक्कत हो रही थी। बाबा के आने पर हम सबने तो उनकी बंदगी कर ली, परंतु पापा उठ नहीं पा रहे थे। उनकी आंखों से आंसू बह निकले। उस समय कृपानिधान सद्गुरूदेव की असीम अनुकम्पा देखने को मिली। वो खड़े हो गए और अपना दायां पैर उठाकर पापा के हाथ के पास बढा दिया और पापा ने सहजता से बन्दगी कर ली। इस असीम अनुकम्पा से अभिभूत हो हम सबकी आंखों से अश्रुधार बह निकले।

मालिक बाबा की कृपा दृष्टि ही है कि इतनी कम उम्र में ही मेरी पुत्री सुश्री शुचि जिसे मैंने एक बार कभी समझाया था कि सब जगह भगवान होते हैं और सबमें भगवान होते हैं। इस बात को उसने इतनी गहराई से लिया कि सबको कहती फिरती है पता है तुममें भी भगवान है, हम में भी भगवान है वो सबकुछ देखते हैं। जब कुछ दिक्कत होता है उसे, बस हाथ जोड़कर भगवान को याद करने लगती है।
मालिक बाबा के सदुपदेशों को सदैव सामने रखकर मैं आचरण करने की कोशिश करता हूं और इस भवसागर में अपनी नैया को पार लगाने का प्रयास करता हूं। कभी कभी सोचता हूं कि मालिक बाबा का अनुग्रह नहीं प्राप्त हुआ होता तो पता नहीं इस भवसागर में कितनी बार अंधकूपों में भटक गया होता। परम पुरूष परमात्मा को कोटि—कोटि धन्यवाद।

नमन तुम्हें शत बार है गुरूवर, नमन तुम्हें शत बार है ।
पाप—पुण्य का भेद कराया,
दया धरम का मार्ग दिखाया ।
स्नेह भरा जो हाथ फिराया, कोटि—कोटि आभार है ।।
नमन तुम्हें शत बार है......................
सत की नाव में मुझे बिठाया,
नाम रूपी पतवार थमाया ।
निराकार का भेद बताया, वो रूप तेरा सा​कार है ।।
नमन तुम्हें शत बार है......................
क्रोध—लोभ को पास न लाना,
माया मोह से बच के रहना ।
माया ठगिनी बड़ी सयानी, तूने किया खबरदार है ।।
नमन तुम्हें शत बार है......................
हम अज्ञानी इंद्रिय वश में,
बंधते जाते भव बंधन में ।
तूने ज्ञान की ज्योति जलाकर,
तन और मन दोनों धुलवाकर ।
आतम—राम का मिलन कराकर, किया बड़ा उपकार है ।।
नमन तुम्हें शत बार है.....................
शुभेश विनवत बारम्बार है...................
नमन तुम्हें शत बार है.....................

साहेब बन्दगी!! साहेब बन्दगी!! साहेब बन्दगी!!

बुधवार, 15 अगस्त 2018

शिकायती लाल

2:32:00 pm
शिकायती लाल

बन्दौं तुमको गिरधर गोपाल
जगत—पिता सबके प्रतिपाल
अपनी शिकायतों का पिटारा ले,
फिर पहुंचा ये शिकायती लाल
तुम भी मुझसे त्रस्त हो गये होगे
शायद इसीलिए मुंह फेर लिये होगे
मैं क्या करूं भगवन मैं भी विवश हूं,
आपने कुछ विकल्प कहां छोड़ा है
मैं जानता हूं कि आपके पास बहुतेरे काम हैं,
पर बताएं मुझे किसके भरोसे छोड़ा है
प्रभु आप तो सर्वज्ञ हैं, फिर भी मौन हैं
बताएं हम कहां जाएं और कौन है
कर्म ही है वश मेरे, वो करता हूं
धर्म बस दया है, जो करता हूं
यूं तो मैं खुद दया का पात्र हूं भगवन तेरे
पर धरम हेतु हर जीव पर सदैव दया करता भगवन मेरे
गुरूवर कह गये हैं— दया धरम का मूल है
सद्गुरू कबीर भी कह गये—

दया राखि धरम को पाले, जग से रहे उदासी
अपना सा जी सबका जाने ताहि मिले अविनाशी

बस इन्हीं वचनों का पालन कर रहा हूं
पग—पग फूंक कर कदम रख रहा हूं
न किसी का मुझसे अहित हो
न कुछ टूटे न कोई मुझसे रूठे
पर अविनाशी ईश्वर ही मुझसे रूठ गये हैं
और किसको मनायें हम तो सचमुच टूट गये हैं

साहब तुमही दयालु हो, तुम लगि मेरी दौर
जैसे काग जहाज को, सूझे और न ठौर

कहीं और ठौर नहीं प्रभु, नाव भवसागर में हिचकोले खा रही
प्रभु हम क्या करें, कहां जाएं, कुछ समझ में नहीं आ रही

साहब से सब होत हैं, बन्दा से कछु नाहिं
राई से पर्वत करें, पर्वत राई माहिं

परंतु तुम तो जैसे मेरी परीक्षा लेने पर ही तुले हो
मानो मेरी व्यथा से आंख मूंद लिये हो
तभी तो राई समान दु:ख को भी पहाड़ बना दिये हो
शांति—प्रेम—संतोष को ही अपने पास बुला लिये हो
मैं परबत समान सुख की अभिलाषा नहीं रखता
बस मेरा कर्तव्य है, जो कर्म वही हूं करता
अब इनके अभाव में मैं क्रोध न करूं तो क्या करूं
विवश हो शिकायतों का पिटारा न खोलूं तो क्या करूं
अब तुम ही दु:ख भंजन हो, सब दुखियारी के
तो राह दिखाओ तुम, सर्व सहायी हो

न, किसी और दर की, कोई आस न शेष
प्रभु कृपा करो अब तेरे शरण 'शुभेश'

रविवार, 5 अगस्त 2018

बड़की दादी - गुरू मॉं

4:54:00 pm
बड़की दादी
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सहज शांत तेजोमयी सूरत ।
ममतामयी जगदम्बा की मूरत ।।
निर्मल ह्रदय, करूणामय दृष्टि ।
अविरल स्नेह से सींचत सृष्टि ।।

गुरू मॉं की तो छवि है ऐसी ।
स्वयं विराजे गुरूवर जैसी ।।
साहेब बन्दगी चरण कमल में ।
श्रद्धा—भाव हैं सजल नयन में ।।

तुम सम कौन कहूं उपकारी ।
जो आवे कुटिया दु​:खियारी ।।
मातृत्व स्नेह की बारिश करती ।
पल में उनकी पीड़ा हरती ।।

गुरूवर के साधना—पथ की तुम,
अविचल औ निर्भीक संगिनी ।
दया—धरम का पाठ पढ़ाती,
भव—भय दूर कराती जन की ।।

माई साहब, बड़की काकी और बड़की दादी,
केवल नाम नहीं श्रद्धा है ।
कोटि—कोटि वंदन चरणों में,
जन—जन की पावन आस्था है ।।

शुभेश करतु हैं बंदगी,
बिनवौं बारम्बार ।
बड़की दादी दया करो
विनती करो स्वीकार ।।

रविवार, 22 जुलाई 2018

मालिक बाबा

1:26:00 pm
मालिक बाबा
(परम पूज्य बौआ साहब जू)

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'मालिक बाबा' बचपन में यह नाम सुनते ही रोमांच भर जाता था। अभी भी इस नाम—मात्र से एक विलक्षण उर्वरा शक्ति का विकास हो जाता है।
मुझे आज भी बचपन की वो घटना याद है जब मैं लगभग साढ़े तीन वर्ष का था। इतनी छोटी उम्र में घटित घटना ने मेरे मन—मस्तिष्क पर ऐसा प्रभाव डाला था कि वो हमेशा कल की बात लगती है।
मॉं उस समय बहुत बीमार थी। वह सुध—बुध खोकर बिस्तर पर पड़ी थी। दादी, पापा सब ने बताया कि मॉं बीमार है, भगवान से बोलो वो तुम्हारी मॉं को ठीक कर देंगे। मैं उस समय भगवान शब्द से भी अनजान था। घर में मॉं के बिस्तर के पास ही मालिक बाबा की तस्वीर लगी थी। मै। वहां जाकर खड़ा हो गया और निश्छल भाव से मालिक बाबा को सम्बोधित कर कहने लगा— '' हे मालिक बाबा हमर मॉं के सब दु:ख दूर करियौ ओकरा ठीक क' दियौ।'' और मेरी आंखों से निरंतर आंसू बह रहे थे। तभी मॉं ने आवाज लगायी— ''हां देखै ने हम ठीक छियै, बाबा तोहर बात सुनि लेलखुन— हम ठीक भ' गेलियौ।'' उनकी आंखों से भी अश्रु—धारा प्रवाहित हो रही थी।
 आज भी वो निश्छल प्रेम को याद करता हूं और ज्ञानेन्द्रियों के जाल से मुक्त होकर उसी भाव में बहकर अपने आराध्य सद्गुरू की आराधना करना चाहता हूं। परंतु इनकी शक्ति और माया का कोई पार नहीं है। जब कभी परिवार में कोई परेशानी होती, हम दौड़ कर मालिक बाबा के पास पहुंच जाते। हमें पूर्ण विश्वास था कि वो उसका हल जरूर निकालेंगे और सदैव ऐसा ही होता था।

दादी के अनन्य प्रयास, हमारे प्रति अगाध प्रेम तथा मालिक बाबा में पूर्ण विश्वास के फलस्वरूप वो सुखद घड़ी भी आ गई जब अल्पायु में ही मुझे सभी बांधवों सहित अपने परम आदरणीय मालिक बाबा के और निकट होकर उनके शिष्य बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। अब वे हमारे मालिक बाबा के साथ—साथ परम श्रद्धेय पूज्य सद्गुरूदेव भी थे।
 किसी भी आकुलता के समय उनकी कुटिया पर पहुंचकर शांति मिल जाती थी। मैं थोड़ा संकोची प्रवृति का व्यक्ति हूं। इसलिए कई बार मैं अपनी आकुलता में कुटिया पर चला तो जाता था परंतु वहां सबों के सामने कुछ बोल नहीं पाता था। लेकिन मालिक बाबा के दर्शन मात्र से ही आकुलता शांत हो जाती थी। उनकी शीतल वाणी तो अंतरतम को शीतल कर देती थी। दरभंगा में भी जब कभी बाबा कहीं आते थे तो हम लोग भागकर उनकी बंदगी करने जाते थे और उस दिन को धन्य मानते थे कि आज उनके दर्शन हुए।
 एक और बाल सुलभ घटना स्मरण हो रही है जिसका उल्लेख किये बिना नहीं रहा जाता। बचपन में परीक्षा के समय प्रत्येक बच्चों में परिणाम को लेकर आशंका/भय व्याप्त रहता है। इसलिए कई साथी भगवान के आगे घरों में अथवा मन्दिरों में परीक्षा में लिखने वाले पेन/कलम को रख देते थे और उसी कलम से परीक्षा में लिखते थे, इस से उनमें परिणाम को झेलने की शक्ति मिलती थी। (ऐसा उस समय मेरे जैसे कई छात्रों का विचार था) मेरी भी बोर्ड की परीक्षा थी। मैं भी बेहतर परिणाम की अभिलाषा में मालिक बाबा से आशीर्वाद लेने पहुंचा(हमारे लिए एकमात्र सब कुछ हमारे मालिक बाबा थे/हैं)। मैं साथ में एक नहीं दो—दो नई कलम ले गया था। कुटिया पर पहुंच कर बाबा को बंदगी की। बाबा ने कुशल—क्षेम पूछा और तत्पश्चात भोजन ग्रहण करने को कहा। मैं संकोचवश कुछ बोल नहीं पा रहा था और वहां से भोजन के लिए हट भी नहीं पा रहा था। बाबा ने पूछा क्या बात है और अपनी समस्या बताने के लिए कहा। आखिरकार मैंने अपनी संकोच को दूर कर बोला — '' बाबा अपनेक आशीर्वाद लेब' आयल छी, मैट्रिक के परीक्षा छै।'' और एक पेन निकालकर आगे कर दिया। बाबा पहले हंसे, फिर बोले— ''देखू बौआ बिनु पढने जौं सब आशीषे सं' पास भ' जेतै त अपने सोचियौ कतेक अकर्मण्यता आबि जेतै। अहि लेल पढ़ाई त बहुत जरूरी छै। मन लगा क पढू अवश्य पास होयब।'' मैं थोड़ा निराश होने लगा। फिर बाबा मुस्कुराते हुए मेरे हाथ से कलम ले लिए और मेरे दायें हाथ पर उससे भगवत् नाम लिखने लगे। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। मैंने झट दूसरा पेन भी आगे कर दिया और बोला—''बाबा कहीं बीच में ही पेन खत्म भ' गेलै त, तैं इहो पेन पर कृपा करियौ।'' बाबा हंसते हुए उस पेन से भी  मेरी हथेली पर लिखने लगे। फिर उन्होंने अत्यंत कृपा की जिसे याद कर आज भी शरीर रोमांचित हो उठता है। उन्होंने अपने दोनों हाथ मेरे मस्तिष्क पर रख दिया। आशीर्वाद का ऐसा अनुग्रह पहले कभी नहीं प्राप्त हुआ था, मैं अभिभूत हो उठा।

अवतार जिस गुरूदेव का युगधर्म ले होता सदा।।
उस महामानव के लिए दृढ़ भक्ति होवे सर्वदा।।
हे नाथ जग में प्रकट हों तव संत की शुभ आत्मा।
जो कलह—दु:ख—कुविचार का जग से करें नित् खात्मा।।
संत रूप भगवान,
            प्रकटे जग में सर्वदा।
दे सबको शुभ ज्ञान,
            करैं सुखी संसार को।।
                            (सद्गुरूदेव द्वारा रचित प्रार्थना से)
अनेकों ऐसी छोटी—बड़ी घटनाएं हैं जो हमें निश्चिंत करती थी कि हमारे साथ हमारे मालिक स्वयं मालिक बाबा हैं। हमारी सभी दु:खों/समस्याओं का हल निकालने वाले, हम पर कृपा करने वाले साक्षात प्रभु।
 मालिक बाबा के बारे में शायद बहुत कम लोग जानते होंगे कि आज भरवाड़ा कबीर आश्रम में होने वाले इतने विशाल वार्षिक भण्डारा के शुरूआती वर्षों में बाबा उसके आयोजन के लिए पूरे वर्ष तक प्रतिदिन अपने एक समय के भोजन बचाकर रखते थे ​ताकि भण्डारा में कोई भी संत द्वार से भूखे न लौटें। सभी दीन—दु​:खियों की सेवा में उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। उस समय लोगों के पास इलाज के लिए न धन होता था और न ही कोई सुविधा थी। उन्होंने अपने विलक्षण जड़ी—बूटी के ज्ञान का उपयोग कर लोगों की नि:शुल्क/नि:स्वार्थ सेवा देना प्रारम्भ किया और पूरे लगन से दीन—दु:खियों की सेवा में सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।

मैं जब अपनी नौकरी लगने की सूचना देने उनके पास गया तो वे अत्यंत हर्षित हुए। फिर जम्मू जैसे आतंकवाद से ग्रस्त क्षेत्र में अपनी पोस्टिंग की बात बतलाई तो उन्होंने भगवत सुमिरन की सलाह दी और सब कुछ भगवान पर छोड़ने को कहा। उस समय मुझे यह कतई भान नहीं था कि यह मेरी उनसे अंतिम भेंट होगी। मैं जब जम्मू जाने की तैयारी कर रहा था तो दिल्ली में उनके अत्यंत अस्वस्थ होने की सूचना मिली। मन व्याकुल हो गया और आकुलता में मैंने अपने मालिक बाबा के स्वास्थ्य लाभ हेतु विनती लिखी—

हे दीन दयाल दया कीजै ।
हम दीन अबोध की अरजी लीजै ।।

हे नाथ, सनाथ तुमहि से हम,
नहिं हमे अनाथ प्रभो कीजै ।।

हे जगत—पिता, हे परम—पूज्य,
विनती बस इतनी है तुमसे ।
हम सबके नाथ और पूज्य गुरू,
की स्वास्थ्य कामना है तुमसे ।।

हे नाथ कृपालु कृपा कर दो ।
हम सबकी खाली झोलियां भर दो ।।

हे दीन—दयाल, हे कृपा—निधान,
अरजी मेरी इतनी सुनिये ।
प्रभो नाथ हमारे गुरूवर को,
चिर स्वास्थ्य—लाभ को वर दीजै ।।

हे दीन दयाल दया कीजै ।
हम दीन अबोध की अरजी लीजै ।।

परंतु भगवान को कुछ और ही मंजूर था। वर्ष 2009 के आखिर में वो सबसे दु:खद दिन भी आया। उन दिनों में मैं अपनी सेवा के प्रारम्भिक दौर में जम्मू में था। पापा का फोन आया, वो बोले— ''हम सब अनाथ भ' गेलौं, मालिक बाबा नै रहलाह।'' शरीर सुन्न पड़ गया। मालिक बाबा ​के बिना हमलोग जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। सचमुच हम अनाथ हो गये।
    हे परम पूज्य श्रद्धेय मालिक बाबा हम आज भी आपके बताये राह पर चलने का प्रयास करते हैं। प्रयास इसलिए लिख रहा हूं, क्योंकि कभी—कभी उलझनें, बाधाएं, समस्याएं इतनी कमर तोड़ देती है कि राह से भटकने लगता हूं। अंधविश्वासी भी बन जाता हूं। मालिक बाबा आपके बिन हम सचमुच अनाथ हैं। अपने हिसाब से सबकुछ अच्छा करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। भगवत् भजन के लिए मिलने वाले हर मौके पर सदैव उन परम् पुरूष परमात्मा के निराकार स्वरूप का ध्यान करते हैं, जिसका भेद आपके साकार रूप ने कराया था। फिर भी बाधा—विघ्न रूपी दीवार नहीं टूटती, जिन्दगी उलझती चली जाती है। मन अशांत होकर अंधविश्वासी बना देता है। यहां—वहां सबको प्रणाम करते हुए सबसे पागलों की तरह क्षमा—याचना करता रहता हूं। उन राहों को जिनके बारे में कभी आपने बताया था कि वो सब व्यर्थ हैं, केवल परमात्मा का भजन और कर्म ही सब कुछ है, पर अनायास ही चल पड़ता हूं। हे परम पूज्य मालिक बाबा हमें शक्ति प्रदान कीजिए की हम परमात्मा के मार्ग पर दृढ़ होकर प्रगतिशील रहें।
हे परम पूज्य गुरूदेव जू, हम अनाथ पर दया कीजै।
हम दीन अबोध की अरजी लीजै,
प्रभु मोहि​ अपने शरण लीजै।।

    शुभेश   
सप्रेम साहेब बन्दगी—3

रविवार, 29 मई 2016

हे दीन दयाल दया कीजै

12:50:00 pm
हे दीन दयाल दया कीजै ।
हम दीन अबोध की अरजी लीजै ।।

हे नाथ, सनाथ तुमहि से हम,
नहिं हमे अनाथ प्रभो कीजै ।।

हे जगत—पिता, हे परम—पूज्य,
विनती बस इतनी है तुमसे ।
हम सबके नाथ और पूज्य गुरू,
की स्वास्थ्य कामना है तुमसे ।।

हे नाथ कृपालु कृपा कर दो ।
हम सबकी खाली झोलियां भर दो ।।

हे दीन—दयाल, हे कृपा—निधान,
अरजी मेरी इतनी सुनिये ।
प्रभो नाथ हमारे गुरूवर को,
चिर स्वास्थ्य—लाभ को वर दीजै ।।

हे दीन दयाल दया कीजै ।
हम दीन अबोध की अरजी लीजै ।।
                                      .....शुभेश
(परम पूज्य गुरूदेव के स्वास्थ्य लाभ हेतु प्रभु से विनती हेतु नवम्बर,2009 में रचित)

गुरू की वाणी अमृत जैसा

12:37:00 pm
गुरू की वाणी अमृत जैसा
Gurudev+ki+vani
गुरू की वाणी अमृत जैसा
मीठा नहीं मधुर कोई वैसा ।
बरसों की प्यासी धरती पर,
इन्द्रदेव की कृपा के जैसा ।
गुरू की वाणी...............

गुरू ही सबको मार्ग बतावें
सबको सदा सुपंथ चलावे ।
उस मार्ग पर सदा जो चलता
होता भला सदा ही उसका ।

जाति—पांति का भेद मिटाकर
सब से सच्ची प्रीत लगाकर ।
मानव की सेवा जो करता
निज धाम को प्राप्त वो करता ।

गुरू का वचन सदा जो माना
भव—बन्धन से है छुटि जाना ।
सब व्याधि को दूर वो कर दें
जन्म—मरण की पीड़ा हर लें ।

गुरू की वाणी औषधि ऐसा ।
गुरू की वाणी अमृत जैसा ।।
                            .....शिवेश

सतगुरू की महिमा

11:55:00 am
सतगुरू की महिमा

Param+Pujya+Gurudev+Shriyut+Baua+Saheb

अजब निराले सतगुरू मेरे, चलो दर्शन कर आते हैं ।
ज्ञान—प्रेम की अविरल धारा, चलकर खूब नहाते हैं ।।
अजब निराले सतगुरू ..........................................

भव्य ललाट और बाल सुनहरे, देख मुग्ध हो जाते हैं ।
सतगुरू की मूरत को लखकर, मिलकर शीश झुकाते हैं ।।
अजब निराले सतगुरू ..........................................

हम सब मिलकर ऐसे गुरू की, नित दिन वन्दन करते हैं ।
वचनामृत सुनकर हम उनके, धन्य स्वयं को करते हैं ।।
अजब निराले सतगुरू ...............................................
ज्ञान—प्रेम की अविरल धारा.......................................
                                                                     .....शिवेश

शनिवार, 7 मई 2016

अपरंपार दयालु भगवन

5:44:00 pm
हे अपरंपार दयालु भगवन, कर धय थाम लियो ।
भटक रहा था भव कूपों में, तूने खींच लियो ।।
हे अपरंपार ........................

मैं तो जड़मति, अति अज्ञानी,
क्रोधी, लोभी, महा अभिमानी।
तूने ज्ञान की गंगा बहाई,
गुरू मूरत में छवि दिखलाई।
गुरू पद पंकज, अंतरतम की सारी विघ्न हरौ।।
हे अपरंपार ........................

हे प्रभु कैसे होऊं उऋण मैं,
कोटि जन्म बस करहुं भजन मैं।
तव प्रताप की बात निराली,
सारी दुनिया हुई मतवाली।
जेहि रंगेहु प्रभु तेरे रंग में, नहिं दूजा रंग चढ़ौ।।
हे अपरंपार ........................

निर्मल तन—मन कीजिए स्वामी
तव चरणों का बनूं अनुगामी।
कीजै नाथ ह्रदय मंह डेरा,
आवागमन का छुटि जाए फेरा।
मुझ पर कृपा करहुं प्रभु इतनी, नाम कबहुं नहिं मैं बिसरौं।।
हे अपरंपार ........................
                                                        ~~~~~शुभेश

मंगलवार, 14 जुलाई 2015

गुरूवर नमन तुम्हें शत बार है

10:29:00 pm
गुरूवर नमन तुम्हें शत बार है
नमन तुम्हें शत बार है गुरूवर, नमन तुम्हें शत बार है ।
पाप—पुण्य का भेद कराया,
दया धरम का मार्ग दिखाया ।
स्नेह भरा जो हाथ फिराया, कोटि—कोटि आभार है ।।
नमन तुम्हें शत बार है.............................................
सत की नाव में मुझे बिठाया,
नाम रूपी पतवार थमाया ।
निराकार का भेद बताया, वो रूप तेरा सा​कार है ।।
नमन तुम्हें शत बार है.......................................
क्रोध—लोभ को पास न लाना,
माया मोह से बच के रहना ।
माया ठगिनी बड़ी सयानी, तूने किया खबरदार है ।।
नमन तुम्हें शत बार है..........................................
हम अज्ञानी इंद्रिय वश में,
बंधते जाते भव बंधन में ।
तूने ज्ञान की ज्योति जलाकर,
तन और मन दोनों धुलवाकर ।
आतम—राम का मिलन कराकर, किया बड़ा उपकार है ।।
नमन तुम्हें शत बार है...................................................
                                                                   ~~~शुभेश

सोमवार, 13 जुलाई 2015

हे अपरंपार पार करो नैया

3:13:00 pm
पार करो नैया
हे अपरंपार पार करो नैया फंसी है बीच भंवर में ।
तुम बिन दूसर कोई न खेवैया, इस अथाह सागर में ।।
हम हैं पापी अवगुण राशि, करम अधम अति मेरे ।
सुख—दु:ख, धन—संपति और विपदा, हैं सब माया तेरे ।।
लोभ—क्रोध, मद—मोह जनित यह पाप की गठरी भारी ।
कैसे पार करूं मैं भव को, हूं अब शरण तुम्हारी ।।
हम नादान चंचल अज्ञानी, विनती करूं मैं कैसे ।
जैसे तारा गज और गणिका, तारो हमको वैसे ।।
                                                          ~~~शुभेश
('सत्य की ओर' पत्रिका में प्रकाशित)

प्रभु मोहि अटल भक्ति दीजै

2:49:00 am
प्रभु मोहि अटल भक्ति दीजै
                प्रभु दीन दयाल दया कीजै ।
                मेरे सब अपराध क्षमा कीजै ।।
इस जग माया में जब मैं आया,
आतम ज्ञान सकल बिसराया ।
                ठगिनी माया चाप चढ़ाई,
                लोभ मोह की बाण चलाई ।
जीव में प्रकट कीन्ह अभिमाना,
फंसि गए लाखों संत सुजाना ।
                हे प्रभु मैं तो जड़मति बालक,
                तुम ही रक्षक तुम प्रतिपालक ।
माया मोह दिन—रात सतावै,
लोभ—क्रोध की अग्नि जलावै ।
                तव चिन्तन में मन नहिं लागै,
                मन नहिं थिरै न चित ठहरावै ।
हे प्रभु कोई जतन कीजै,
अब मोहि अपने शरण लीजै ।
                नित नाम सुमिरूं शक्ति दीजै ।
                प्रभु मोहि अटल भक्ति दीजै ।।
प्रभु दीन दयाल ...........................
मेरे सब अपराध ...........................
                                              ~~~शुभेश