मंगलवार, 14 जुलाई 2015

कभी सुबह तो होगी

कभी सुबह तो होगी
सूरज की लालिमा बिखर चुकी है,
रात का अंधियारा छंट चुका है ।
उगते हुए उस बड़े से सूरज को देख
वो मासूम बचपन याद आ रहा है,
जो कहीं खो गया है, गुम हो गया है ।।

आप कहते हैं मैं अभी सात का हूं,
तो कहां छुपा है, यहीं है, यही तो है तेरा बचपन ।
हां यहीं है मेरा बचपन, खयालों में ही सही,
यहीं है, यहीं है मेरा बचपन ।।

खयालों में ही सही, हमउम्रों को देख मैं भी
धूलों में लोटता हूं, गांव की गलियों में दौड़ता हूं ।
कंचे खेलता हूं, धूम मचाता हूं, खयालों में ही सही ।
मालिक के डांटने पर, पीटने पर मां बालों में
प्यार से हाथ फेरती तो है, खयालों में ही सही ।
हां बचपन तो है, खयालों में ही सही ।।

कल एक प्लेट ही तो टूटी थी,
या फिर मेरी किस्मत ही फूटी थी ।
उसने गालियों की जो गुबार निकाली थी,
सुनकर शायद शरम भी शरमाई थी ।
पर मैं, मैं नहीं शरमाया
मैं तो वहीं बुत बना खड़ा था ।
शायद खुद को ढूंढ रहा था ।।

अब तो मेरे आंसू भी सूख गये हैं,
ये तो रोज की बात है, कह वो भी रूठ गये हैं ।
कभी गाली, कभी मारपीट, यही अब मेरी कहानी है,
भर—पेट खाने की लालसा में, बीती जा रही जिन्दगानी है ।।

ऊषा की लालिमा तो रोज आती है,
सारे जग के अंधकार मिटाती है ।
मेरा अंतर्मन मुझे देता है रोज दिलासा,
कि कभी तो कोई आएगा ।
जो मसीहा बनकर मेरे,
सिसकते हुए बचपन को फिर से हंसाएगा ।।

सपनों की वो जमीं कभी सच तो होगी ।
हां 'शुभेश' आज न सही मेरे लिए भी, कभी सुबह तो होगी ।।
                                                       ~~~शुभेश
***Please Strictly Avoid Child Labour***

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